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07.12.2007
 
कीमती वोट?
नवीन चन्द्र लोहनी

दिन ढलने तक लगातार हाड़-तोड़ श्रम करने के बाद थके-मांदे घर की ओर रुख उसने किया ही था कि मालिक ने टोका “कल चुनाव है, काम बन्द रहेगा ।”

काम बन्द, अर्थात मजदूरी नहीं । अपने दो दिन से बीमार पड़े बच्चे की दवा, पत्नी की तार-तार होती धोती तथा मकान मालिक के शेष किराए की याद करते-करते उसने चुनाव तथा मालिक दोनों को जी भर कोसा।

घर पहुँचते ही उसने खद्दर धारी नेता टाईप आदमी को घर की ओर आते देखा । नेता जी ने पूछा -”इस बार वोट किसे दे रहे हो?” थकान और अयाचित प्रश्न पर खीझते हुए उसने कहा-

"आपसे मतलब?”

प्रश्नकर्त्ता नेता जी ने खीसें निपोरी और आगे बढ़ कर पाँच का नोट उसके हाथ में रख दिया बोले “इस बार वोट इसी निशान को देना ।” उन्होंने चुनाव चिन्ह युक्त एक कागज उसकी ओर बढ़ाया ।

कुछ डर कर सतर्कतावश उसने कहा “पाँच रुपए?”

नेता जी ने उसके प्रश्न का उत्तर अपने मन में वोट कम कीमत देने के रुप में लगाया। फिर इधर से रुपयों में वोटों की कीमत ऊपर चढ़ने लगी, दस, बीस, पचास, सौ, दो सौ आदि। इस बीच वह समझ गया कि इस वोट की कीमत है। अंतिम मूल्य के तय होते-होते मतदाता ने घर के सभी सदस्यों की लम्बी फेहरिस्त बताते हुए वोटों की कीमत वसूल ली।

उसे पता चल गया कि रोज रात को पड़ोसी बाबू के रेडियों में “वोट कीमती है इसका सदुपयोग कीजिए” का विज्ञापन इसी कारण दोहराया जाता रहा होगा। चुनावों के प्रति सायंकाल मन में उमड़ा आक्रोश शांत हो गया, उसने ईश्वर से हाथ जोड़ कर प्रार्थना की “हे ईश्वर मेरे देश में हर रोज चुनाव होते रहें।”

उसके महीने भर का गुजारा हो गया। उसने मन ही मन सायंकाल दी गालियाँ वापस ले लीं। उसकी प्रजातंत्र में आस्था परवान चढ़ने लगी ।

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