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ISSN 2292-9754

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10.23.2014


सज़ा

"तुम्हारा नाम क्या है?" कटघरे में खड़े खूँखार से दिखने वाले मुज़रिम से सफाई वकील ने पूछा।

"विक्की उस्ताद," मुज़रिम ने होंठ चबाते हुये कहा।

"तो तुमने कलक्टर साहिबा पर गोली चलाई?"

"हाँ, चलाई गोली...," विक्की उस्ताद ने सीना तानकर कहा।

"मगर क्यों?" सफाई वकील ने पूछा।

विक्की जज साहिबा को देख रहा था। कोई जवाब नहीं दिया।

"मैं पूछता हूँ कि तुमने कलक्टर साहिबा पर गोली क्यों चलाई?" इस बार वकील साहब ने थोड़ी सख़्ती दिखाई।

"पैसा मिला था," विक्की ने बिना किसी लाग-लपट के सहज ही कह दिया।

"किसने दिया पैसा?" वकील साहब ने अगला सवाल किया।

उसने काई उत्तर नहीं दिया। वह लगातार जज साहिबा को देखे जा रहा था।... शायद कुछ पहचानने की कोशिश कर रहा था।

"मैं पूछता हूँ कि किसने दिया पैसा?" सफाई वकील के स्वर कठोर हो गये। माथे पर त्योरियाँ चढ़ आईं। विक्की पर इसका कोई असर नहीं हुआ। पुलिस, वकील, जज और सज़ा आदि शब्द उसके लिये नये नहीं थे।

"किसी ने दिये हों.. तुम्हें क्या। अपुन के धंधे में यह सीक्रेट है। अपुन अपने धंधे से बेईमानी नहीं कर सकता। .. अपुन दागा गोली उस कलक्टर की छाती पर। तुम अपुन को सज़ा सुना दो। अपुन ज़्यादा पचड़े में नहीं पड़ना चाहता," विक्की ने एक पेशेवर अपराधी की तरह बिना किसी ख़ौफ के दो टूक जवाब दिया।

"तुमने अपनी सगी बहन पर ही गोली दाग दी!" इस बार सफाई वकील ने विक्की को तोड़ने के लिये उसके हृदय पर कुठराघात किया।

"मेरी बहन...!" उसका मुँह खुला का खुला रह गया ... "यह क्या कह रहे हैं वकील साहब। अपुन ने अपनी बहन पर नहीं रकाबगंज की कलक्टर मिस पांडे पर गोली चलाई है।"

"क्या तुम्हारा असली नाम विक्रम देशपांडे नहीं। क्या ज्योति देशपांडे तुम्हारी बहन नहीं है? क्या तुम विकास देशपांडे के इकलौते बेटे नहीं हो?" वकील साहब ने विक्की उस्ताद की पारिवारिक पृष्ठभूमि की पिटारी खोल दी।

"हाँ, मैं श्री विकास देशपांडे का इकलौता बेटा विक्रम देशपांडे हूँ और मेरी बहन का नाम भी ज्योति देशपांडे है।... लेकिन, ज्योति का इस केस से क्या ताल्लुक है," विक्की ने सच्चाई बयान करते हुये हैरानी व कोतुहल से पूछा।

"मिस ज्योति देशपांडे का इस केस से गहरा ताल्लुक है योर ऑनर ... क्योंकि मिस ज्योति देशपांडे ही वह कलक्टर हैं जिन पर इस मुज़रिम विक्की ने गोली चलाई है," वकील साहब ने विक्की की ओर इशारा करते हुये कहा। विक्की उस्ताद उर्फ विक्रम देशपांडे को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था ... मैंने अपनी बहन, अपनी दीदी ज्योति पर गोली चलाई है। यह कैसे हो सकता है? .. नहीं.. नहीं.. वह ज्योति नहीं... वह तो कलक्टर पांडे थी, पर.. शायद... हाय! यह मुझसे क्या हो गया.. वह सिसक पड़ा। आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। वह खड़ा न रह सका। अपना सिर पकड़ कर वहीं कटघरे में बैठ गया। उधर विक्की उस्ताद की पारिवारिक हिस्ट्री सुनकर जज साहिबा, जो अब तक केस की फाइल के पन्ने पलट रहीं थी.. एकाएक चौंक गईं। उन्होंने पहली बार नज़रें उठाकर अभियुक्त विक्की उस्ताद के चेहरे को गौर से देखा ... अरे यह तो सचमुच विक्की है।... मेरा छोटा भाई.. लेकिन अभियुक्त के रूप में...! ...यह कैसे हो सकता है? इतना प्यारा बच्चा हार्ड कोर क्रिमिनल कैसे बन सकता है...? इतने वर्षों बाद भाई-बहन का यह कैसा अद्भुत मिलन है। इन सभी प्रश्नों ने उनके मन में खलबली मचा दी। उन्हें याद आया.... जब विक्की पैदा हुआ था तो घर में कितनी खुशियाँ मनाई गईं थीं। सभी रिश्तेदारों को बुलाया गया था। माँ और पापा दोनों ही बहुत खुष थे। दो लड़कियों के बाद बेटा पैदा हुआ था। कमला चाची माँ से कह रही थीं - दीदी देख लेना यह लड़का अपनी दोनों बहनों से ऊपर जायेगा। दादी ने हॉ में हाँ मिलाते हुये कहा - और नहीं तो क्या। लड़कियों को तो पढ़-लिखकर भी घर का चौंका-चूल्हा ही करना होता है। नाम तो लड़के रोशन करते हैं। ताई ने दादी की बात का समर्थन करते हुये कहा - तुम ठीक कहती हो दादी.. लड़कों से ही वंश चलता है। लड़के ही पिंड-दान करते हैं।

विक्की जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ने के लिये शहर के सबसे बड़े कॉन्वेंट स्कूल, सेंट ज़ेवियर भेजा गया। वह तब आठवीं में थी और ज्योति सातवीं में। हम दोनों बहनें पास ही के सरकारी स्कूल में पढ़ती थीं। धीरे-धीरे विक्की बड़ा होता गया। माँ और पापा के असीम लाड़-प्यार ने उसे ज़िद्दी व मुँहफट बना दिया था। घर पर वह किसी से ढंग से बात नहीं करता था। माँ और पापा की तो वह हर बात काट देता था। पापा ने तंग आकर उसे दून स्कूल भेज दिया। सोचा, दूर हॉस्टल में रहेगा तो ठीक हो जायेगा। लेकिन, वह नहीं सुधरा। विक्की दसवीं के बोर्ड इक्ज़ाम में फेल हो गया। स्कूल वालों ने उसे स्कूल से निकालने का नोटिस भेज दिया। नोटिस में उसके आचरण को लेकर भी शिकायत की गई थी। पापा ने किसी तरह सिस्टर लुसाटा के सामने हाथ-पैर जोड़कर विक्की को एक और चांस दिलवाया। लेकिन, भाग्य को तो कुछ और ही मंज़ूर था। एक दिन खबर आई कि विक्की अपने मैथ के टीचर को अधमरा करके स्कूल से भाग गया है। ख़बर सुनकर माँ के तो जैसे प्राण ही निकल गये। पापा से रोते हुये बोलीं – "आप कुछ भी करिये। मुझे मेरा विक्की चाहिये।.. मैं उसके बिना ज़िंदा नहीं रह सकती.. मुझे मेरा विक्की चाहिये.. मैं उसे समझाऊँगी। वह मेरी बात नहीं टालेगा। वह एक समझदार लड़का है। वह ज़रूर अच्छा बनेगा।"

पापा भी उदास थे। हम दोनों बहनें भी खूब रोई थीं। ज्योति तब सिविल सर्विसिस की तैयारी कर रही थी और मैं जूडिशियल की। पापा ने विक्की को खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। टी.वी., अखबार, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड सभी सार्वजनिक स्थानों पर, जहाँ कहीं भी पब्लिक की नज़र जा सकती थी, विक्की की तस्वीर लगाई गई। लेकिन विक्की न जाने कहाँ छिप गया था। न जाने कौन सी ज़मीन उसे निगल गई थी। उसका कहीं पता न चला..। विक्की के ग़म में माँ और पापा दोनों बीमार रहने लगे और पिछले साल.. पहले पापा और फिर माँ हम सब को अकेला छोड़कर इस दुनिया से चले गये। दोनों की आँखें, अंतिम साँसों तक अपने प्यारे बेटे विक्की के आने का रास्ता निहारती रहीं। माँ ने जाते-जाते मुझे अपने पास बुलाकर कहा – "सागरिका, विक्की का ख्याल रखना। वह एक अच्छा लड़का है।" ... और आज विक्की मिला भी तो एक ऐसे अपराधी के रूप में, जिस पर अपनी ही बहन पर गोली चलाने का आरोप है ....। जज साहिबा ने टेबुल पर पड़ी अपनी ऐनक पहनते हुये कहा – "द कोर्ट इज़ एडज़र्न टिल मंडे।"

सोमवार को कोर्ट खचाखच भरी हुई थी। आज यहाँ एक ऐसे केस का फैसला होने वाला था जहाँ अभियुक्त उसी जज का भाई था जिसने उसे सज़ा सुनानी थी। हालाँकि ऐसे केसों में जहाँ अभियुक्त का जज के साथ कोई पारिवारिक रिश्ता हो प्रतिवादी के आवेदन पर केस किसी दूसरे जज की अदालत में ट्रास्फर हो जाता है .. लेकिन यहाँ स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत थी। जज साहिबा पूरे शहर में अपने तटस्थ न्याय के लिये प्रसिद्ध थीं। लिहाज़ा प्रतिपादी के वकील को इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं थी। आज विक्की उस्ताद उर्फ विक्रम देशपांडे कटघरे में सिर झुकाये उस हारे हुये जुआरी की तरह खड़ा था जिसने ज़िंदगी के जुए में अपना सब कुछ गँवा दिया हो। उसका शरीर ढीला पड़ चुका था। उसे आज अहसास हो गया था कि अपनों के मरने का क्या दु;ख होता है। उसे यह भी मालूम हो गया था कि सामने न्याय की कुर्सी पर बैठी जज साहिबा और कोई नहीं उसकी अपनी बड़ी बहन सागरिका है।

"क्या तुम्हारी कोई और बहन है?" वकील साहब ने अदालत में घर बनाते हुये मौन को तोडते हुये कहा।

"हाँ.. वकील साहब मेरी एक और बहन.. सा.. ग... रि.. का है।" विक्की की ज़बान बड़ी बहन के सामने लड़खड़ा गई। सफाई वकील ने जज साहिबा की ओर उन्मुख होकर कहा – "लीजिए योर आर्नर, केस एकदम साफ है। मुलज़िम विक्की खुद स्वीकार कर रहा है कि उसने कलक्टर मिस ज्योति पर गोली चलाई.. यह तो भगवान का शुक्र है कि गोली मिस ज्योति के कंधे को छूती हुई निकल गई.. वरना कुछ भी हो सकता था।.. लेकिन, योर आर्नर इससे मुलज़िम विक्की का अपराध कम नहीं हो जाता। मुलज़िम एक पेशेवर अपराधी है इसलिये मेरी अदालत से दरख़्वास्त है कि मुलज़िम विक्की उस्ताद उर्फ विक्रम देशपांडे को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये। दैट्स ऑल योर आर्नर।"

वकील साहब सामने लगी कुर्सी पर बैठ गये। बहन ज्योति के बचने का समाचार सुनकर विक्रम की आँखों में चमक आ गई। उसके दोनों हाथ अपने आप भगवान का धन्यवाद करने के लिये जुड़ गये। होंठों से बरबस निकल पड़ा – "परमात्मा तेरा लाख - लाख शुक्र है... तूने इस पापी पर रहम करते हुये दीदी को बचा लिया।" उसकी आँखों में आँसू आ गये।

"तुम्हें अपनी सफ़ाई में कुछ कहना है?" जज साहिबा ने अभियुक्त विक्की उस्ताद से पूछा।

"हाँ, जज साहिबा मुझे कुछ कहना है लेकिन अपने बचाव में नहीं। मैं एक मुजरिम हूँ.. एक बेहद खूँखार मुजरिम। मैंने न जाने कितने घरों को उजाड़ा है। लाखों लोग मेरे कारण बेघर हुये हैं। पैसा लेकर.. हर तरह का काम करता हूँ मैं। यह कलक्टर.. क्या नाम है इसका.. मिस ज्योति देशपांडे यहाँ रकाबगंज में कानून का राज चलाना चाहती थी। वह कॉलोनी शहर के प्रसिद्ध बिल्डिर सेठ दीनानाथ की बनाई कॉलोनी थी... वही सेठ दीनानाथ, जिनके पैसों से तमाम राजनीतिक पार्टियों के खर्च चलते हैं। शहर के कई अफसरों की अय्याशी चलती है। उनके सभी प्रकार के उल-जलूल खर्च चलते हैं। उसी सेठ की कॉलोनी को गैरकानूनी बताकर.. यह कलक्टर उसे गिराना चाहती थी। वह मीडिया के द्वारा सेठ साहब पर दवाब बनाने की कोशिश भी कर रही थी। मैंने फोन पर उसे बहुत समझाया .. लेकिन उस पर ईमानदारी का भूत सवार था.... वह नहीं मानी.... और मैंने उसे गोली मार दी। समाज में लोग मुझे गुंडा कहते हैं... पर, अपने साथियों के लिये मैं उस्ताद हूँ .. विक्की उस्ताद .. लेकिन, आज तक किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि पूरे “शहर में अपनी ईमानदारी व सच्चाई के लिये मशहूर, एक कर्त्तव्यपरायण पुलिस इंस्पैक्टर श्री विकास देशपांडे का इकलौता बेटा विक्की देशपांडे, विक्की उस्ताद कैसे बना। मुझे अपराधी बनाने वाले वे सभी लोग.. वे सभी माँ-बाप हैं जो अपने बेटों को अपनी बेटियों से अधिक प्यार करते हैं। जो समाज में अपने बेटों को अपनी बेटियों से ज़्यादा अहमियत देते हैं। उनकी हर नजा़यज़ माँग... हर गलती यह सोचकर माफ़ कर देते हैं कि बच्चा है। बड़ा होकर ठीक हो जायेगा। .. कुल का चिराग है यह।.. इसी के हाथों मोक्ष की प्राप्ति होगी। .. इसी से हमारा वंश चलेगा। .. अगर, पापा ने मेरे फेल होने पर मुझे फटकारा होता.. माँ मेरी गलतियों पर परदा न डालती तो आज यह विक्की.. विक्की उस्ताद न होता। आज यहाँ, मेरी हर माँ-बाप से हाथ जोड़ कर विनती है कि वे बेटा-बेटी में कोई फर्क न समझें। अपने बेटे को इतना लाड न दें कि उसका स्वाभाविक विकास रुक जाये। वह अपनी नजायज़ इच्छा शक्तियों का गुलाम बन कर रह जाये। बचपन की बेलगाम बुरी आदतें ही भविष्य में व्यक्ति की मानसिक पंगुता का सबब बनती हैं...।"

वह फूट - फूट कर रोने लगा। उसके आँसुओं की बहती धारा के सामने आज नदियाँ व समुद्र भी छोटे पड़ने लगे। जज साहिबा की आँखों में भी आँसू आ गये। ख़ुद को सँभालते हुये वे बोलीं – "द कोर्ट इज़ एडज़र्न टिल नैक्स्ट डे।"

घर आकर विक्रम की बड़ी बहन सागरिका बिना कुछ खाये-पिये ही पंलग पर लेट गई। वह उन जजों में से थी जो फर्ज़ के लिये के अपना सब कुछ दाँव पर लगाने के लिये सदैव तैयार रहते हैं। .. ओह .. आज कैसी परीक्षा की घड़ी आ गई है। एक ओर उसका अपना सगा भाई है तो दूसरी और फर्ज़ की दीवार। .. उसने अपनी आँखे मूँद लीं। फर्ज़ और भ्रातृ-प्रेम में संघर्ष होने लगा। कभी फर्ज़, भ्रातृ प्रेम पर चढ़ बैठता तो कभी भ्रातृ-प्रेम फर्ज़ की मज़बूत दीवार को भेद कर उससे कह उठता... नहीं सागरिका आखिर विक्की तुम्हारा वही भाई है जिसे बचपन में तुम अपने हाथों से तैयार करके स्कूल भेजती थीं। यह वही विक्की है जिसे खिलाये बिना तुम्हारा पेट नहीं भरता था। जिस दिन वह तुमसे रूठकर, मम्मी-पापा के साथ सोता था उस दिन तुम सारी रात करवटें बदलती रहती थीं। मम्मी-पापा के जाने के बाद तुम्ही उसकी मम्मी-पापा हो। .. याद है .. माँ ने मरते हुये क्या कहा था .. विक्की का ख्याल रखना। ... आज उसी विक्की की ज़िदगी तुम्हारी कलम पर निर्भर है।.. कोर्ट में बेचारा कैसे फूट-फूट कर रो रहा था... यही सब सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गई पता ही न चला।

अगले दिन जज की कुर्सी पर बैठते ही वह सब कुछ भूल गईं। जज साहिबा ने अपना फैसला सुनाते हुये कहा – "विक्की उस्ताद उर्फ़ विक्रम देशपांडे एक अपराधी है। उसने स्वयं अपना अपराध कबूल किया है। उसने साफ कहा है कि उसने कलक्टर मिस ज्योति देशपांडे को जान से मारने की कोशिश की है। अदालत विक्की को मुज़रिम मानती है लेकिन विक्की उस्ताद में उत्पन्न अपराधबोध व पश्चाताप की भावना को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कानून हर अपराधी को सुधरने का मौका देता है। अदालतों का कार्य समाज को दुरुस्त करना भी होना चाहिये.. लिहाज़ा, अदालत विक्की उस्ताद उर्फ़ विक्रम देशपांडे को पाँच साल की कठोर सज़ा सुनाती है।" .. और एक बहन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।


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