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| 06.19.2007 |
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देवकी |
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देवकी का मन कैसा तो मगन हो रहा था। इस प्रकार के आनन्द का अनुभव उन्होंने
पहले कभी नहीं किया था।...
वे कंस के कारागार की एक कोठरी में बंदी थीं;
फिर भी जाने क्यों लग रहा था कि उनके चारों ओर दीवारें नहीं थीं। वे किसी
अत्यंत विस्तृत और उन्मुक्त स्थान पर बैठी थीं। कभी लगता था कि वे मेघों पर
बैठी हैं;
और मेघ खुले आकाश में भ्रमण कर रहे हैं। कभी लगता था कि वे स्वयं ही मेघ
हैं और पवन के पंख लगा कर वे सारे ब्रह्मांड में उड़ती फिर रही हैं। फिर
लगता वे स्वयं ही आकाश भी हैं। सूर्य,
चंद्रमा,
ग्रह, नक्षत्र सब उनके खिलौने हैं। सब उनकी प्रसन्नता के लिए हैं। वे सब
उनके चारों ओर घूम रहे हैं; और हाथ जोड़े उनकी आज्ञा का पालन करने की
प्रतीक्षा में हैं।... इस कोठरी में तो वे खेल-खेल में आ बैठी हैं; जैसे
कोई बच्चा लुक्का-छिपी खेलता हुआ अपने मित्रों को भ्रम में रखने के लिए,
घर के किसी अज्ञात कोने में आ छिपा हो।... आत्मा का मनोरंजन तो उससे भी
अधिक लीलामय है। सवेच्छा से आ कर शरीर-रूपी इस पिंजरे में बंद होकर बैठ गई
है;
और स्वयं को बंदिनी कहने लगी है। सातों समुद्रों के वक्ष पर उन्मुक्त भ्रमण
करने वाले एक विराट जलपोत ने,
शरीर रूपी इस सांकल से स्वयं को बाँध लिया है,
और स्वयं को लंगर का बंदी मानने लगा है।...
अगले ही क्षण लगता कि वे समुद्र की लहरों पर आसन जमाए बैठी हैं। लहरें उनको
झूला झुला रही हैं। कभी वे अपनी पेंग बढ़ाती हुई जल के पहाड़ पर जा बैठती
हैं;
और कभी किसी जलप्रपात पर आरूढ़ होकर वे सागर के तल पर आ जाती हैं। फिर आभास
होता कि वे स्वयं ही समुद्र हैं। ये लहरें तो उनके अपने हाथ-पैर हैं।
इन्हें जहाँ तक फैलाना चाहें,
फैला सकती हैं।
चाहें तो अभी चंद्रमा को अपनी मुट्ठी में बाँध कर,
उसे खींच कर धरती पर ला सकती हैं; और चाहें तो अपनी मुट्ठी खोल कर तारों का
चूर्ण सारे आकाश पर फैला कर,
उसका श्रृंगार कर सकती हैं। ये वन,
नदियाँ और पर्वत, उनकी दृष्टि के आनन्द के लिए थे।... वे सारी सृष्टि के
केन्द्र में थीं;
और सारी सृष्टि उनकी इच्छा मात्र से बन और बिगड़ रही थी...
क्षीरसागर जैसे उनकी गोद में मचल रहा था। शेषनाग को वे अपनी हथेलियों में
उठा लेती थीं और वह विराट नाग, गौर वर्ण का एक नन्हा सा बालक बन कर किस
मधुर ढंग से उनकी ओर देखकर पुकारता था, ''माँ !''
एक और शिशु भी था - साँवला सा। अत्यंत नटखट। चुलबुला, जैसे पारा। एक स्थान
पर टिकना ही नहीं जानता था,
जैसे ऊर्जा का सागर हो। लहरों सा थिरकता आता था;
और जब तक कोई पकड़े-पकड़े,
वह हाथों से फिसल कर कहीं दूर चला जाता था। क्षीर सागर तो उसके आंगन जैसा
था।...यह तो स्वयं शेषशायी नारायण ही थे,
किंतु कैसे बालक बने उपद्रव कर रहे थे। मन होता था,
उसे पकड़ कर अपने हृदय में रख लें। पर वह पकड़ में कहाँ आता था। पवन के नटखट
झोंके सा आता था और उस गौर बालक को परे धकेल कर कहता था, ''चल भाग। ये तेरी
नहीं,
मेरी माँ हैं।''
गौर
बालक क्रोध में पैर पटकता था, ''तेरी माँ हैं तो क्या मेरी माँ नहीं हो
सकतीं !''
''जा तुझे दूसरी माँ दी।''
साँवला हँसता था।
गौर
बालक दाँत पीस कर कहता था, ''दूसरी क्यों
?
ये ही क्यों नहीं
?''
साँवला हँसता था। धींगामस्ती करता था; और हँसता ही जाता था, ''क्योंकि ये
मेरी हैं।''
''मेरी भी हैं।''
''इस जन्म में नहीं ! तेरी नहीं हैं। मेरी हैं।''
''मेरी क्यों नहीं
?''
''मेरी इच्छा।''
जाने कितनी देर तक देवकी उनकी क्रीड़ा देखती रहीं। दोनों एक दूसरे को
धकियाते हुए,
धींगामस्ती करते,
उनकी ओर बढ़ते थे। उनकी गोद में बैठने को मचलते थे;
किंतु बैठता एक भी नहीं था। पास आते थे; और फिर दूर निकल जाते थे... जैसे
पवन के उन्मुक्त झोंके,
जैसे समुद्र की अटखेलियाँ करती लहरें,
जैसे मेघों में मचलती चपलाएँ,
जैसे पर्वत से उतरते,
झपटते,
सरपट दौड़ते झरने ...
''क्या बात है देवकी
?''
''आज समझ पाई हूँ कि संसार का सारा आनन्द तो मेरे भीतर है।''
''आनन्द तुम्हारे भीतर है; या तुम ही आनन्दस्वरूपा हो
?''
वसुदेव हँस पड़े।
''मैं आनन्दस्वरूपा हूँ। मैं ही यह सब कुछ हूँ। सर्वत्र हूँ, सर्व-व्यापक
हूँ। व्योमातीत हूँ, निरंतर हूँ।''
''कंस सुनेगा तो भय से ही मर जाएगा।'' वसुदेव हँस रहे थे।
''अहमेकमिदम सर्वं व्योमातीतं निरंतरम्। पश्यामि कथं आत्मानं
प्रत्यक्षं वा तिरोहितम्।।''[1]
वसुदेव उनकी ओर देखते रहे : उनके लिए भी यह देवकी का कोई नया सा रूप था।
''कंस को तो मरना ही होगा।'' देवकी बोलीं, ''क्योंकि वह समझता नहीं कि
मेरा न कभी जन्म हुआ, न मेरी मृत्यु होगी। मैं कभी भी यह शरीर नहीं थी।''
''तो तुम कौन हो देवकी
?''
वसुदेव पूर्णत: गंभीर थे।
''मैं अपने स्वभाव से निराकार सर्वव्यापी आत्मा हूँ।''
वसुदेव देख रहे थे: देवकी सचमुच वह देवकी नहीं थीं। वे तो कुछ और ही हो गई
थीं।
''देवकी ! दत्तात्रेय ने कहा है कि पंचभूतात्मक विश्व मृगमरीचिका है।
भ्रम है। मैं किसको नमस्कार करूँ
?
क्योंकि एक मैं ही तो निरंजन हूँ।''
''उन्हें सत्य का बोध हुआ। उन्होंने उसे वाणी दी।'' देवकी बोलीं, ''मुझे
स्वयं अपने-आप पर आश्चर्य होता है कि मैं इतनी दुखी किस बात से थी
?
वह सारा दु:ख तो एक दु:स्वप्न था। जाने मैंने उसे कैसे सत्य मान लिया। कैसे
सत्य मान लिया उस नारकीय संसार को !''
''वह दु:ख नहीं था,
तपस्या थी; और तपस्या के बिना माया का भ्रम दूर नहीं होता।''
वसुदेव बोले, ''माया का भ्रम हट जाए तो फिर आनन्द स्वयं ही उद्घाटित हो
जाता है।''
''शायद कुछ ऐसा ही है।''
देवकी ने कहा, ''मेरे कान बाँसुरी की ऐसी मीठी टेर सुन रहे हैं,
जैसी मैंने कभी नहीं सुनी। मुझे लग रहा है कि मेरे भीतर अलौकिक पुष्पों की
बगिया महक रही है। दसों दिशाओं में सुगंध ही सुगंध है। मैं जैसे अपनी ही
वाणी पर मुग्ध हो रही हूँ।... यह क्या है आर्यपुत्र ! सागर,
वन,
पर्वत,
नदियाँ - सब मेरे भीतर हैं। मैं यह शरीर मात्र नहीं हूँ,
मैं विराट हूँ, विराट अस्तित्व।...''
बाहर कुछ लोगों के आने की पदचाप सुनाई दी। आने वाले बहुत शीघ्रता में थे।
कोई बोल नहीं रहा था, सब जैसे भाग रहे थे।
''क्या हो गया है इनको
?''
वसुदेव जैसे अपने-आपसे पूछ रहे थे;
किंतु उत्तर कौन देता !
आरक्षी आकर उनके द्वार के आसपास खड़े हो गए तो देवकी और वसुदेव को समझने में
कठिनाई नहीं हुई कि कोई बड़ा अधिकारी कारागार के निरीक्षण के लिए आ रहा
है।...और फिर एक द्वारपाल ने आकर उनकी कोठरी का ताला खोल दिया।...कुछ
सशस्त्र सैनिक आकर कोठरी की दीवारों से लग कर खड़े हो गए।
प्रद्योत और प्रलंब के साथ कंस ने प्रवेश किया।
वसुदेव एक ही दृष्टि में पहचान गए कि कंस बहुत घबराया हुआ था; किंतु अपने
भय को छिपाने के लिए वह बहुत आक्रामक मुखौटा धारण किए हुए था।
''कैसी हो देवकी
?''
उसने प्रश्न अवश्य पूछा; किंतु उसमें जिज्ञासा का तनिक सा भी भाव नहीं था।
''मैं पूर्णत: स्वस्थ और प्रसन्न हूँ...।''
देवकी के स्वर के माधुर्य को सुन कर कंस चौंक उठा। उस स्वर में न क्रोध
था, न घृणा, न पीड़ा।
''तनिक भी उद्विग्न नहीं हो
?''
कंस कुपित हुआ, ''विचलित नहीं हो
?
आशंकित भी नहीं हो
?
भय नहीं है तुम्हें कि तुम अपने आठवें पुत्र को जन्म दोगी;
और मैं उसे अपना संभावित हत्यारा घोषित कर राजद्रोह के अपराध में मृत्युदंड
दूँगा।''
वसुदेव कहना चाहते थे, ''अधर्म, अन्याय और पाप का विरोध, राजद्रोह कब से
होने लगा कंस
?''
किंतु वे बोले नहीं। वे भी देवकी का उत्तर सुनना चाहते थे। देवकी आज कुछ और
ही हो गई थीं...
''अस्तित्व और अनस्तित्व में कोई विशेष अंतर नहीं है भाई !'' देवकी अपने
मीठे और कोमल स्वर में बोलीं, ''यह भ्रम मात्र है। जो है,
वह दिखाई नहीं देता;
और जो दिखाई देता है,
वह है नहीं...''
कंस का शरीर थरथरा कर रह गया।
''समझ सको तो समझने का प्रयत्न करो।''
देवकी पुन: बोलीं, ''जो है,
उसका अभाव नहीं हो सकता; और जो नहीं है,
उसका भाव नहीं हो सकता।''
प्रद्योत कुछ आगे बढ़ कर कंस के निकट आ गया, ''यह तो भय के मारे विक्षिप्त
हो चुकी।''
''आदेश हो तो अभी मैं इसके अस्तित्व-अनस्तित्व को एक कर दूँ।''
प्रलंब ने अपना खड्ग निकाल लिया था।
उसके साथ ही सैनिक भी अपने शस्त्रों को साध प्रहारक मुद्रा में आ गए थे।
वसुदेव स्फूर्ति से कूद कर उनके मध्य आ गए थे... किंतु देवकी ने सहज भाव से
अपनी भुजा बढ़ा कर उन्हें एक ओर कर दिया, ''मेरे मन में तुम्हारे प्रति
करुणा के सिवाय और कुछ नहीं है भाई ! क्योंकि तुम नहीं जानते कि आततायी,
शत्रु के शस्त्र से नहीं,
अपने पाप से मारा जाता है।''
''क्या बक रही हो।''
कंस की वाणी भय से काँप रही थी, ''मेरे एक संकेत पर मेरे ये मित्र तुम्हारा
शीश काट कर तुम्हारे पति को भेंट कर देंगे।''
देवकी हँस पड़ीं, ''तुम्हें अपने मित्रों के खड्ग दिखाई पड़ रहे हैं;
किंतु तुम उस धरती को नहीं देख रहे,
जो तुम्हारे रक्त की पिपासा से अपनी जिह्वा लपलपा रही है। सत्य खड्ग नहीं
हैं,
सत्य तो यह धरती ही है। शायद आज तक तुम्हें किसी ने नहीं बताया कि पापियों
का रक्तपान कर धरती पवित्र होती है।''
देवकी उसके निकट चली गईं, ''कहो अपने मित्रों से कि वे मेरी हत्या का
प्रयत्न कर देखें।...रक्त तो अब वही बहेगा,
जिसे धरती पीना चाहती है। मुंड उसी का कटेगा,
जिसे चामुंडा धारण करना चाहती है। मार कंस ! मुझे मार!...''
देवकी का स्वर गर्जना से भर उठा था।
कंस
स्तब्ध रह गया।... यह क्या हुआ देवकी को
?
यह वह देवकी नहीं थी,
जिसे कंस जानता था। वह डरी सहमी,
काँपती हुई,
अश्रु बहाती,
भीरु देवकी नहीं थी।... कौन थी यह
?
कहीं यह स्वयं चामुंडा ही तो नहीं
?
...प्रद्योत कह रहा है कि वह दुखों से विक्षिप्त हो गई है;
किंतु वह विक्षिप्त नहीं है। कंस विक्षिप्त लोगों की आँखें भली प्रकार
पहचानता है। देवकी विक्षिप्त नहीं है। पहले उसका स्वर कैसा मधुर था। वह
स्वर देवकी का नहीं था।... और अंत में उसका स्वर कितना प्रचंड था। वह स्वर
भी देवकी का नहीं था।... किसका था वह स्वर
?
कंस को लगा,
वह पागल हो जाएगा।... यह कोई अभिचार था
?
कोई तांत्रिक प्रयोग
?
किसी प्रेत का प्रवेश हुआ था देवकी के शरीर में
?
किसका प्रेत था वह
?
कौन कंस को डरा रहा था
?
कहीं वह प्रेत यह तो नहीं चाहता कि कंस अपने आवेश में देवकी का वध कर
डाले... देवकी की आठवीं संतान के जन्म से पहले देवकी का वध ! ... तो फिर वह
भविष्यवाणी झूठी हो जाएगी। कंस की मृत्यु अदृश्य हो जाएगी। कौन खोजेगा,
उस मृत्यु को
?
''मैं तुम्हें मारने नहीं आया देवकी !'' कंस ने निर्भीक दिखने का नाटक
किया, ''मेरी तुमसे कोई शत्रुता नहीं है। मैं केवल अपनी मृत्यु का शत्रु
हूँ। उसी को खोज रहा हूँ।''
''अपने जीवन में तो अपनी मृत्यु को कोई नहीं खोज पाया।''
देवकी का मधुर कोमल स्वर लौट आया था, ''और मरने के बाद अपनी मृत्यु को
खोजना नहीं पड़ता। इसलिए मृत्यु को मत खोजो, वही तुम्हें खोज लेगी। जिसका जो
काम है,
उसे करने दो।... और मृत्यु को खोजने कहाँ जाना है,
वह तो तुम्हारे इसी शरीर के भीतर है। तुम्हारे इस शरीर के जन्म के साथ ही
उसका भी जन्म हुआ था। तुम आज तक उसकी अनदेखी करते आए हो। किंतु उसकी दृष्टि
एक क्षण के लिए भी तुमसे नहीं हटी है। वह तुम्हें देख रही है।...''
''महाराज ! महाराज !''
प्रलंब ने कंस को झकझोरा, ''यह स्त्री आपको पागल कर देगी। इसकी बातें मत
सुनिए। या तो इसका वध करने का आदेश कीजिए या फिर यहाँ से चलिए।''
''जाओ कंस जाओ।''
देवकी हँस पड़ीं, ''अपने बचे-खुचे दो-चार दिन अपने ढंग से जी लो। आकंठ मदिरा
पी लो; और मदिरा पीते-पीते ही मर जाओ।...जाओ,
मरने से पहले अपनी पत्नियों को उन स्त्रियों के नाम बता दो,
जिनका तुमने आखेट किया है। जाओ,
अपने पुत्रों को बताओ कि वृद्धावस्था में अपने पिता को कैसे बंदी किया जाता
है। किंतु तुम्हारी तो वृद्धावस्था आने वाली ही नहीं है। वृद्धावस्था से
पहले तो तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें आ दबोचेगी...।''
प्रद्योत और प्रलंब दोनों ही देख रहे थे कि कंस की ऊर्जा क्षीण होती जा रही
है। न वह देवकी की बातों का कोई उत्तर दे पा रहा है और न उसके हाथ-पैर बाँध
कर उसके मुँह पर पट्टी बाँधने के लिए कह रहा है;
न ही उसके वध का आदेश दे रहा है। वह देवकी की वाणी से पराजित होता जा रहा
था।
''चलें महाराज! अब चलें यहाँ से।''
प्रलंब ने कंस की भुजा पकड़ कर उसे बाहर की ओर घसीटा।
कंस ने जैसे स्वयं को उसके सहारे ही छोड़ दिया था। दूसरी ओर से प्रद्योत ने
पकड़ा।...वे दोनों उसे बाहर ले चले, जैसे किसी असहाय रोगी को कोई ले जाता
है;
किंतु तभी कंस सजग हो गया।...उसके सैनिक,
आरक्षी, उसे इस अवस्था में देख कर क्या सोचेंगे ! उसने अपनी भुजाएँ छुड़ा
लीं और जैसे अपने पैरों पर खड़ा हो गया।
''वसुदेव ! बहुत शीघ्र तुम कंस के क्रोध का सामना करोगे।''
उसने दाँत पीस कर कहा।
वसुदेव बंद होते हुए सीखचों के पास आ गए और मुस्करा कर बोले, ''और आज तक
मैं किसके क्रोध का सामना कर रहा हूँ
?''
किंतु कंस दूर जा चुका था,
उसने या तो वसुदेव का स्वर सुना नहीं या न सुनने का अभिनय किया।
वसुदेव शांत थे; किंतु कहे बिना नहीं रह सके, ''और तुम बहुत शीघ्र
महाविष्णु के क्रोध का सामना करोगे।''
देवकी मुस्कराईं, ''यदि महाविष्णु भी क्रोध करने लगे,
तो उनमें और साधारण मनुष्य में अंतर ही क्या रह जाएगा
?''
''क्रोध का नहीं, तो न्याय का सामना तो करना पड़ेगा।''
''न क्रोध न न्याय! वे तो केवल करुणा ही करते हैं।''
देवकी का मन कह रहा था, ''किंतु कंस को अपने कर्मों का फल तो भुगतना ही
होगा।''
*
*
*
कंस को सारी रात नींद नहीं आई।
क्या सत्य ही देवकी के गर्भ में कोई अलौकिक संतान आ गई है
?
नहीं तो देवकी इतनी बदल कैसे गई
?
वह कंस से डरती नहीं। वह अपनी मृत्यु से भयभीत नहीं है। अपनी संतान के वध
की संभावना से प्रताड़ित नहीं है। कौन उसे इतना निर्भीक बना रहा है
?...और
महावीर कंस,
आत्मविश्वासी कंस,
सर्वशक्तिमान कंस की टाँगें क्यों काँपने लगी थीं
?...
कंस तब गालव ऋषि के आश्रम का ब्रह्मचारी था। ऋषि ने बताया था कि 'सत्व'
की वृद्धि होने पर रजोगुण और तमोगुण की शक्ति क्षीण होने लगती है।...
कदाचित् उसी संदर्भ में उन्होंने कहा था कि मनुष्य का हृदय सत्व से आपूर्त
हो जाए तो उसमें ईश्वर प्रकट होता है।...क्या गालव ऋषि ऐसी ही किसी स्थिति
का वर्णन कर रहे थे। देवकी के हृदय में सत्व की वृद्धि हो गई है,
इसलिए उसमें ईश्वर प्रकट हो गया है या ईश्वर अथवा उसका कोई प्रतिनिधि संतान
के रूप में देवकी के गर्भ में आ गया है,
इसलिए देवकी इतनी निर्भीक हो गई है।
...
पर कंस किसी ईश्वर को नहीं मानता। ईश्वर तो केवल भयभीत हृदय की कल्पना है,
उसकी बाध्यता है।... गालव ऋषि की बातें कंस को न तब स्वीकार्य थीं,
न अब स्वीकार्य हैं। तब भी उसने अपने मित्रों - भौम और बाण - से उनकी चर्चा
की थी और उन्हें हास्यास्पद पाया था। आज भी उसे ये चर्चाएँ उतनी ही
हास्यास्पद लगती हैं। किंतु देवकी
?
देवकी ऐसी कैसे हो गई - इसका उत्तर कौन देगा
?
और जब तक कंस को उसके इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलेगा,
वह सो कैसे पाएगा, उसे निद्रा कैसे आएगी
?
वह मथुरा के राजप्रासाद में,
अपने शयन-कक्ष में,
इस कोमल पर्यंक पर करवटें बदल रहा है;
और उधर वसुदेव और देवकी उस कारागार में आनन्द की नींद सो रहे होंगे। ...
''परिचारिके !''
घबराई हुई परिचारिका दौड़ती हुई आई, ''महाराज !''
''महाराज
की बच्ची ! चषक खाली है; और तू उधर अपने जार से चिपकी सो रही है।''
परिचारिका कुछ नहीं बोली। उसने पात्र से चषक में मैरेय ढाल दी। महाराज की
ऐसी बातों का क्या बुरा मानना। ...आजकल वे प्राय: प्रत्येक रात्रि को
अनिद्रा के कशा से पिटते हुए इस प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं।
विक्षिप्तों के समान व्यवहार करते हैं।
दूसरे कक्ष से निकल कर अस्ति आ गई, ''महाराज अशांत क्यों हैं
?''
परिचारिका क्या कहती। बोली, ''महारानी ! आपका विरह उन्हें व्याकुल कर रहा
है।''
''तू कैसे जानती है
?''
''प्रियतमा के आलिंगन में बँधे बिना किसी रसिक पुरुष को निद्रा आ सकती है
क्या
?''
''कामशास्त्र की पंडिता ! कहीं तेरा कहा सत्य होता तो मैं तेरा मुख
मोतियों से भर देती।'' अस्ति ने कहा, ''कदाचि् तू नहीं जानती कि वे आजकल
मेरी सौत के आलिंगन में पड़े कष्ट पाते रहते हैं।''
''कौन सी सौत महारानी
?''
परिचारिका बोली, ''मैंने तो उनके कक्ष में किसी और कामिनी को नहीं देखा।''
''अनिद्रा।'' अस्ति ने कहा, ''तू उसे कैसे जानेगी।''
(शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास 'वसुदेव' का एक अंश)
[1]
अवधूत गीता, 1/10.
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