| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.15.2007 |
|
कोठी |
|
(एक सरकारी कार्यालय। बड़े बाबू
- ललित खन्ना - अपनी कुर्सी पर बैठे हैं। उनके सामने एक महिला
क्लर्क - माया - खड़ी है।)
ललित : अब यहाँ क्यों खड़ी हो। जाओ,
अपनी सीट पर। कोई काम नहीं है क्या?
माया : काम है न! पर अपनी सीट पर नहीं,
यहीं है।
ललित : क्या मतलब?
माया : ऑफिस आते हुए,
सारे रास्ते मुझे तुम्हारे कपड़ों से,
शरीर से,
पसीने से,
तंबाकू की गंध आती रही। मुझे संदेह है कि तुम फिर से सिग्रेट पीने लगे हो।
ललित : मेरा विचार है कि तुम बस में ही ऑफिस आया करो।
माया : क्यों?
ललित : मोटर साइकिल पर मुझ से चिपकी बैठी रहती हो और कभी तंबाकू सूँघती हो
कभी खैनी। कल कहोगी,
विह्स्की की गंध आ रही है,
या फिर किसी और महिला के पर्फ्यूम की। ... मैं कोई सिग्रेट विग्रेट नहीं
पीता।
माया : अच्छा जी! मैं बस में धक्के खाती आऊँ और तुम मोटर साइकिल पर किसी
ललमुनिया को सैर कराते लाओ। यह बहाना नहीं चलेगा। मोटरसाइकिल इस शर्त पर
खरीदी गई थी कि दोनों एक साथ ऑफिस आएँगे।
ललित : तो फिर अपनी नाक का इलाज कराओ और अब जाओ,
अपनी सीट पर। मुझे बहुत काम है। और तुम भी कुछ काम करो। तुम्हें सरकारी काम
का वेतन मिलता है,
पति से लड़ने का नहीं।
माया : पहले तुम्हारी जेबों की तलाशी लूँगी। ब्रीफकेस टटोलूँगी। तुम्हारा
ड्राअर देखूँगी। मुझे अपनी तसल्ली करनी है।
ललित : यदि सिग्रेट की डिबिया नहीं मिली तो मुझे अपनी पसंद का पर्फ्यूम
खरीदने दोगी?
ताकि तुम्हें मेरे शरीर से तंबाकू या लहसुन-प्याज़ की गंध न आए।
माया : ओ-हो-हो। विज्ञापन देख देख कर तुम्हारी अकल मारी गई है। तुम उस
विदेशी पर्फ्यूम पर पैसा बहाना चाहते हो,
जिसे विज्ञापनों वाली लड़कियाँ सूँघ सूँघ कर आँखें बंद कर पराए मर्दों से जा
चिपकती हैं। तुम्हें हजार बार समझाया है कि वे लड़कियाँ उन नंगे मर्दों से
नहीं चिपकतीं,
वे तो उन पैसों से चिपकती हैं,
जो उन्हें सुगंध निर्माता कंपनियाँ देती हैं।
ललित : अच्छा जाओ,
अपनी सीट पर।
माया : नहीं! पहले अपनी तलाशी दो।
ललित : नहीं! बिल्कुल नहीं। यह आफिस है,
तुम्हें यहाँ मेरी आज्ञा का पालन करना होगा।
माया : चलो बड़े आए आफिस
वाले। आफिस है तो सिग्रेट पीयोगे ...
(माया तलाशी लेने का प्रयत्न करती है। ललित बचता है। कुछ छीना झपटी की सी
स्थिति हो जाती है,
जिसमें माया लगभग ललित पर लदी हुई है। तभी रामलुभाया दमयंती के साथ आता
है।)
दमयंती : (फटी आँखों से उनको देखती है)
हाय राम! दफ्तर है या चकला।
रामलुभाया : यह क्या हो रहा है,
बड़े बाबू! सुना था कि आफिस में बड़े अफसर काम करने वाली लड़कियों से
जबर्दस्ती करते हैं। पर आप ने तो हद कर दी।
(माया हट कर एक ओर खड़ी हो जाती है।)
ललित : मैं जबर्दस्ती कर रहा हूँ या यह कर रही है। और यह दफ्तर की लड़की
नहीं,
मेरी पत्नी है।
रामलुभाया : खैर पत्नी को तो अधिकार होता ही है,
जबर्दस्ती करने का। घर में नहीं कर सकी होगी,
तो यहाँ कर रही है।
ललित : मेरी तलाशी ले रही है।
रामलुभाया : क्यों?
क्या इन्हें संदेह है कि आप अपनी जेब में पराई औरतें छिपाए फिरते हैं।
(हँसता
है)
बड़ी भोली हैं। छिपाई होंगी,
तो दिल में छिपाई होंगी,
उसकी तलाशी ये ले नहीं सकतीं। (माया से)
व्यर्थ है बहन जी!
ललित : हमारी पंचायत आप बाद में करें,
पहले बताइए,
आपका क्या काम है?
रामलुभाया : आपने ही पत्र भेजा था कि मुझे अपने भविष्यनिधि के कागज़ों पर
हस्ताक्षर करने हैं।...और आपने वही समय अपनी पत्नी को अपनी तलाशी के लिए भी
दे दिया।
ललित : (माया को क्रोध से देखता है। वह बाहर चली जाती है।)
आप रामलुभाया हैं?
रामलुभाया : जी! और यह मेरी पत्नी है - दमयंती देवी।
ललित : इन्हें साथ क्यों लाए हैं?
रामलुभाया : यह दिखाने के लिए कि सरकारी दफ्तरों में पत्नियाँ अपने पतियों
की तलाशी कैसे लेती हैं।
ललित : आप अपने दिल की तलाशी दे चुके क्या,
जिसमें पराई स्त्रियाँ छिपा रखी हैं?
रामलुभाया : यहाँ कोई नहीं है जी! बस यही है दमयंती देवी। चारों ओर यही है।
आगे पीछे,
ऊपर नीचे।
दमयंती : (कुहनी मारती है)
अब चुप भी करो।
ललित : रामलुभाया जी! मामला प्राविडेंट फंड का है। नॉमिनी कौन है,
यह जरा गोपनीय विषय है। आपको अकेले आना चाहिए था ...
दमयंती : मैं ही कहाँ आना चाहती थी। पर मेरी सुनता कौन है।
रामलुभाया : तू चुप कर।
(ललित
से)
यहाँ कुछ गोपनीय नहीं है जी! जिसके सामने दिल चीर कर धर दिया,
उससे ये छोटी मोटी बातें क्या छिपानी। यहाँ तो खुला खेल है फर्रुखाबादी।
ललित : अच्छा तो मिस्टर रामलुभाया! ये आपके प्राविडेंट फंड के कागज़ हैं।
इनको हम सरकारी डाक्योमेंट मानते हैं - दस्तावेज़। ज़रा सोच समझ कर हस्ताक्षर
कीजिएगा। इन में संशोधन,
परिवर्तन नहीं होता। बाद में मत कहिएगा कि मैंने तो पढ़ा ही नहीं था। या
मुझे पढ़ना आता ही कहाँ है। मैंने तो बड़े बाबू के कहने पर हस्ताक्षर कर दिए।
रामलुभाया : नहीं! इतना अनपढ़ भी नहीं हूँ,
जितना आप सोच रहे हैं। सरकारी कागज़ हैं। कोई धर्मग्रंथ तो है नहीं कि समझे
बिना माथा टेक दूँ।
ललित : वेरी गुड। चलिए तो आरंभ करें। आज आप जिन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर रहे
हैं,
ये स्थायी काग़ज़ हैं। आपके जीवन भर लागू रहेंगे ...और ... यदि भगवान न करे,
बीच में ही आपका देहांत हो गया ...
रामलुभाया : क्या बेकार की बातें कर रहे हैं आप बड़े बाबू!
ललित : क्या हुआ?
रामलुभाया : मुझे आपकी दोनों बातों पर आपत्ति है।
ललित : (दमयंती देवी की ओर देख कर)
आप बैठ जाइए मैडम! कब तक खड़ी रहेंगी।
(दमयंती देवी एक कुर्सी पर बैठती है।)
ललित : (रामलुभाया से)
किन दो बातों पर?
रामलुभाया : जो आप ने अभी अभी कही हैं।
ललित : (कुछ झींक कर)
क्या कह दिया,
मैंने?
रामलुभाया : आप ने कहा,
भगवान् न करे कि मेरा देहांत हो। कहा कि नहीं?
ललित : कहा,
तो क्या बुरा किया?
आपके प्रति सद्भाव दिखाया।
रामलुभाया : सद्भाव तो ठीक है
;
किंतु कितना अवैज्ञानिक है। कितनी अवैज्ञानिक बात कही आपने। वह भी सरकारी
दफ्तर में।
'भगवान्
न करे'
का क्या तात्पर्य?
देहांत तो सबका होता ही है। मेरा भी होगा। और देखिएगा,
आपका भी होगा। बड़े बाबू हैं,
तो भी अपने देहांत की फाईल दाब नहीं सकेंगे आप। न यह कह सकेंगे कि फाईल मिल
नहीं रही।
ललित : अरे भाई मैंने तो केवल इतना ही कहा था कि बीच में ही,
अर्थात् नौकरी की अवधि में ही,
आपका देहांत न हो जाए।
रामलुभाया : बीच में ही क्या अर्थ। देहांत तो अंत में होता है। जहाँ देहांत
हुआ,
वहीं अंत। आप अपने देहांत को बीच में मान कर उतना ही लंबा जीवन और चाहेंगे,
तो भी नहीं मिलेगा ...
(ललित के चहरे पर परेशानी झलकती है। वह अपने आप को संभालता है।)
ललित : अच्छा यह विवाद छोड़िए। पहले अपना फार्म भरिए।
रामलुभाया : बोलिए।
ललित : यह देखिए। यह कॉलम कहता है : आप के दिवंगत हो जाने के पश्चात्
भविष्यनिधि की राशि किसे दी जाए?
अर्थात् आपका नॉमिनी कौन है?
रामलुभाया : (बलपूर्वक)
मेरी पत्नी को। और किसे देंगे आप?
मुझे आपकी नीयत ठीक नहीं लगती। पूछ रहे हैं कि मेरी मृत्यु के पश्चात् यह
राशि किसे दी जाए।
ललित : यह मैं नहीं पूछ रहा। सरकार पूछ रही है।
रामलुभाया : (इधर उधर देखता है।)
मुझे तो कहीं दिख नहीं रही। (कुर्सी पर बैठी दमयंती को देख कर)
यहाँ तो मेरी ही सरकार बैठी हैं।
ललित : मेरा अभिप्राय शासन से है। गवर्नमेंट। भारत सरकार।
रामलुभाया : बड़ी बौड़म है आपकी सरकार। अरे यह भी कोई पूछने की बात है। किसको
दी जाए?
पत्नी के होते हुए और किसको देंगे। ज़रा दे कर तो दिखाइए। खून पी जाएगी यह -
आपका भी और आपकी सरकार का भी। देखने को ही भोली है ...
(दमयंती उसे आँखें तरेर कर देखती है)
ललित : रामलुभाया जी! ...
रामलुभाया : क्या रामलुभाया जी! अरे भविष्यनिधि का पैसा कोई पड़ौसी की पत्नी
को दे कर नहीं जाएगा। यदि आप ऐसी कोई आशा पाल रहे हों कि आपको या आपके
परिवार में से किसी को गोद ले लूँगा,
तो भूल जाइए। यहाँ कोई इतना मूर्ख नहीं बैठा ...
ललित : (बुरा सा मुँह बना कर जल्दी से)
अरे आपका पैसा है,
जिसको मन आए,
दीजिए। काले चोर को दीजिए,
हमें क्या। ... यहाँ उसका नाम लिखिए,
जिसको भी देना है।
रामलुभाया : (तत्काल लिख देता है)
दमयंती देवी।
ललित : (अपनी अंगुली अगले कॉलम पर रखता है)
संबंध?
रामलुभाया : (लिखता हुआ बोलता भी जाता है)
अत्यंत मधुर। अत्यंत मधुर संबंध हैं हमारे। अंग्रेजी में कहते हैं न -
कॉर्डियल रिलेशंस। वैसे ही हैं।
ललित : (अत्यंत उखड़े हुए स्वर में)
सरकार पूछ रही है,
ये क्या लगती हैं,
आपकी?
रामलुभाया : मैं भी सरकार को ही बता रहा हूँ महाशय! आपको बता कर मुझे क्या
मिलना है।
ललित : आपने लिखा है - मधुर संबंध। यह तो लिखा ही नहीं कि वे आपकी क्या
लगती हैं। सरकार की समझ में इससे क्या आएगा। साफ साफ लिखिए कि वे क्या लगती
हैं आपकी?
रामलुभाया : बड़ी बौड़म है सरकार आपकी। इतना भी नहीं समझती कि सब कुछ वे ही
तो हैं - देवी,
माँ,
सहचरी,
प्राण।
ललित : सरकार की समझ में कुछ नहीं आया।
रामलुभाया : मेरे ही मुँह से सुनना चाहते हैं,
तो सुन लीजिए। और कोई है ही नहीं मेरे जीवन में। जो कुछ हैं,
वे ही हैं। फिल्मी शैली में कहूँ
,
तो वे ही मेरा जीवन हैं,
मेरी प्राण हैं।
ललित : (झल्ला कर)
ओह-हो! संबंध क्या है आपका उनसे?
रामलुभाया : जन्म जन्मांतर का संबंध है। ... ऐसा संबंध,
जिसका कोई नाम नहीं होता। प्यार को प्यार ही रहने दो के तौल पर,
संबंध को संबंध ही रहने दो। उसे कोई नाम न दो।
ललित : तो फिर पैसे को भूल जाओ। वह किसी के खाते में नहीं जाएगा।
रामलुभाया : मैं कुछ समझा नहीं। (मस्ती मुरझा जाती है। स्वर धीमा हो जाता
है)
मेरे पैसे हैं। जिसके खात में चाहूँगा,
उसी के खाते में जाएँगे।
ललित : जब तक संबंध नहीं बताएँगे,
रिश्ते को कोई नाम नहीं देंगे,
पैसे कहीं नहीं जाएँगे। बताइए,
आपकी माँ हैं,
बहन हैं,
बेटी हैं?
रामलुभाया : अरे नहीं। आप तो बल्किल ही कबाड़ा किए दे रहे हैं। मेरी माँ के
देहांत को एक युग बीत गया। बहन और बेटी मेरा प्राविडेंटफंड क्यों लेंगी,
उनके अपने पति नहीं हैं या वे मरेंगे नहीं?
ललित : (उदासीन भाव में मशीनी ढंग से)
सखी हैं,
पत्नी हैं,
रखैल हैं?
रामलुभाया : (क्रुद्ध स्वर में)
तुम आदमी हो या ... अपने ही समान समझ रखा है सबको,
दफ्तर में तलाशी के बहाने लिपटा लिपटी करने वाले। हमारे पवित्र संबंध को
बदनाम कर रहे हो। ... मेरी धर्मपत्नी हैं। आपको कोई आपत्ति है?
ललित : आपत्ति होगी,
तो उनको होगी,
जिन्होंने आपको वर्षों झेला है। मुझे क्यों होगी। ... यही बात आप पहली बार
भी बता सकते थे। पर तब तो आप आदमी नहीं,
कवियों के भी पिताश्री बने हुए थे।
रामलुभाया : कवि आदमी नहीं होता क्या?
ललित : उसे छोड़िए। कहीं कवि का मनुष्यत्व स्थापित करने के चक्कर में अपनी
भविष्यनिधि की राशि ही न गँवा बैठें। ... अब बताइए,
ऐसी कौन सी स्थिति है,
जिसमें आपकी भष्यिनिधि की राशि उन्हें न दी जाए?
(रामलुभाया चकित रह जाता है ...)
रामलुभाया : देने की भी पूछ रहा है और न देने की भी। ... अरे भाई,
ऐसी कौन सी स्थिति हो सकती है! हो भी सकती है क्या?
आप ही बताइए,
ऐसी कौन सी स्थिति हो सकती है?
मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता।
ललित : भगवान् न करे
;
किंतु यदि आपसे पहले उनका देहांत हो जाए। तब?
रामलुभाया : यदि उनका देहांत हो जाए,
तो आप यह धन उनको दे सकते हों,
तो अवश्य दीजिए। स्वर्ग में उनके काम आएगा।
ललित : स्वर्ग में भारतीय करंसी नहीं चलती
;
और वहाँ भारतीय रिज़र्व बैंक की शाखा भी नहीं है।... उसे छोड़िए,
मृतकों को भविष्यनिधि की राशि नहीं दी जाती। वह जीवित लोगों के लिए है।
रामलुभाया : जब आप यह सब जानते हैं तो ऐसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछ ही
क्यों रहे हैं। ... यदि उनका देहांत मुझ से पहले हो जाता है,
तो इसका अर्थ है कि मैं तो जीवित हूँ। मैं नामित व्यक्ति का नाम बदल सकता
हूँ,
पर बदलूँगा नहीं।
ललित : क्यों?
रामलुभाया : उस पैसे से मैं उसकी समाधि बनवाऊँगा। शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया
तो उसे किसी ने रोक लिया क्या?
वह उसकी भविष्यनिधि का ही पैसा तो था,
जो मुमताज़ को मिलना था। पर वह उससे पहले ही चल बसी। किंतु पूरी ईमानदारी से
मुमताज़ का पैसा उसे सौंप दिया शाहजहाँ ने। कौड़ी भी नहीं रखी उसने। ताजमहल
बनवा दिया ... वह ताजमहल बनवा सकता था,
तो मैं एक समाधि भी नहीं बनवा सकता क्या?
ललित : चलिए,
समाधि बनवा दीजिएगा,
पर पहले सरकार से पैसे की वसूली तो आप ही करेंगे न!
रामलुभाया : नहीं! समाधि बनवाने वाला ठेकेदार करेगा।
ललित : देहांत इनका हुआ है,
आपका नहीं। आप जीवित हैं और नौकरी कर रहे हैं। ऐसे में आपके सिवाय और कोई
उस पैसे को हाथ भी नहीं लगा सकता। न ठेकेदार,
न समाधि का पुजारी।
दमयंती : चुप भी करो जी! मुझ जीती जागती का सयापा करवा रहे हो।
रामलुभाया : अरे तो ये ऐसे बेकार के प्रश्न पूछ ही क्यों रहे हैं?
ललित : (कुछ पराजित सा होकर)
चलिए,
दूसरी स्थिति वह हो सकती है,जब
ये आप से तलाक ले लें ...
रामलुभाया : आप भविष्यनिधि के अधिकारी न होते,
या कोई और व्यक्ति ऐसा प्रश्न करता,
तो पूछते ही एक जूता लगाता ससुरे के सिर पर। ...अरे कोई भली महिला क्यों
लेगी तलाक?
साली अमरीकन है क्या?
और दमयंती देवी तो बिल्कुल ही नहीं लेगी। दमयंती ने तो तब भी तलाक नहीं
लिया था,
जब नल जूए में सब कुछ हार कर कंगाल हो गया था। अच्छा हो कि ऐसा प्रश्न करने
वाले की पत्नी उससे तलाक भी न ले और किसी और के साथ भाग जाए ...
ललित : चलिए यही सही ...
रामलुभाया : क्या यही सही,
कि दमयंती देवी किसी पराए पुरुष के साथ भाग जाए?
ललित: नहीं,
दमयंती देवी नहीं। चलिए,मेरी
पत्नी यदि किसी परपुरुष के साथ भाग जाए,
तो मेरा प्राविडेंट फंड किसे दिया जाए?
रामलुभाया : यह आप सोचिए,
यह मेरा सिरदर्द थोड़ी है। आपकी वाली तो भागने भगाने वाली टाईप लगती भी है।
...
दमयंती : मैंने कहा जी! आप अपना मुँह बंद नहीं रख सकते?
रामलुभाया : अच्छा,
अच्छा। मैं तो इतना ही जानता हूँ जी! कि मेरी दमयंती तो किसी और की ओर
देखेगी भी नहीं,
भागने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।...
ललित : आपको इतना विश्वास कैसे है?
रामलुभाया : अरे चार डग
उठाती है तो हाँफ जाती है। मेरे साथ चल तो सकती नहीं,
किसी और के साथ भाग कैसे जाएगी। ... और हाँ! वह मुझ से तलाक भी नहीं लेगी।
अब कारण मत पूछिएगा।
ललित : हम कब चाहते हैं कि आपका तलाक हो। पर आप कल्पनाशील व्यक्ति हैं।
कल्पना कीजिए कि यदि ऐसी स्थिति आ जाए,
तो क्या आप चाहेंगे कि आपका प्राविडेंट फंड का पैसा उनको दे दिया जाए?
रामलुभाया : वैसे तो ऐसी स्थिति आई तो मैं नामांकन बदल सकता हूँ,
बदल दूँगा। उसमें कठिनाई ही क्या है। ... पर जैसा कि आपने अभी कहा है कि
मैं कल्पनाशील व्यक्ति हूँ। मेरी कल्पना में एक दृश्य जागता है : दमयंती
देवी ने मुझ से तलाक ले लिया है,
क्योंकि वह किसी और से विवाह करना चाहती है। नहीं तो क्यों लेगी तलाक?
दमयंती : हैं जी?
क्यों करना चाहूँगी किसी और से विवाह?
रामलुभाया : अरे नहीं तो तलाक ही क्यों लोगी।
दमयंती : पर मैं तलाक ही कहाँ ले रही हूँ?
रामलुभाया : तू चुप कर री। मैं समझता हूँ तेरी बात,
पर अब प्रश्न कल्पनाशीलता का है। मैंने कल्पना न की,
तो यह बड़ा बाबू समझेगा,
मैं कल्पना कर नहीं सकता ...
दमयंती : आप कर लें,
मुई कल्पना से विवाह। मैं किसी और से विवाह करना क्यों चाहूँगी?
ललित : यह
'कल्पना'
किसी लड़की का नाम नहीं है।
रामलुभाया : अरे भागवान! अमरीकनों की देखा देखी। क्या पता तेरा भी मन बदल
जाए।
दमयंती : फालतू की बातें मत करो। तुम्हारा मन अमरीकनों के समान बदल रहा है
क्या?
कोई पसंद आ रही है?
रामलुभाया : अरे कैसी बातें करती हो?
मुझे तो लगता है,
इस ऑफिस की हवा ही गंदी है। यहाँ आते ही लोगों के मन में कलुषित विचार आने
लगते हैं।
दमयंती : अभी तो मना कर रहे हो,
पर मैं बता दूँ,
यदि तुमने ऐसा कुछ कर भी लिया न,
तो वह चौथे दिन तुम्हारा सारा घर बुहार कर,
बिस्तर लपेट कर चल देगी। वह माल ले जाएगी और मैं गले में फंदा डाल छत से
लटक जाऊँगी। अपने फंड से अपनी ही समाधि बनवाते रहना।
ललित : मेरा आपसे निवेदन है कि इन्हें बाहर बरामदे में बैठा आइए,
नहीं तो आप आपस में झगड़ते रहेंगे और यह फार्म कल शाम तक नहीं भरा जाएगा।
दमयंती : मैं तो साथ आ ही न रही थी। ये ही घसीट लाए कि दफ्तर में दो मिनट
का तो काम है। कागज जमा करा कर,
बाजार में चाट पकौड़ी खाएँगे। मैं क्या जानती थी कि सरकार भी ऐसे झमेले वाले
कागज माँगती है।
ललित : दमयंती देवी! आप बाहर चलिए। छाया में बैठ कर ठंडा पानी पीजिए। इच्छा
हो तो चाट पकौड़ी खाइए। पर यहाँ से जाइए।
रामलुभाया : अरे वाह! अपनी वाली को तो इसलिए भगा दिया,
क्योंकि वह लिपटा लिपटी कर रही थी। मेरी दमयंती ने क्या किया है कि उसे भगा
रहे हो।
दमयंती : मैं तो अब यहाँ से हिलती भी न! जाने तुम क्या ऊटपटांग पूछो और ये
क्या उलटा सीधा बताएँ। न बाबा न! मैं अपनी जिंदगी खराब न होने दूँगी।
रामलुभाया : अरे तू काहे घबराए है। मैं कोई मूरख हूँ कि तुझे छोड़ किसी और
को कुछ दे दूँ। मैं क्या तेरी जरूरत न समझूँ। (ललित से)
आप पूछो जी।
ललित : यदि ये आप से तलाक ले लें,
तो क्या आप अपना प्राविडेंट फंड इन्हें ही देना चाहेंगे।
रामलुभाया : क्यों न देना चाहूँगा?
आप ही बताइए कि क्यों न देना चाहूँगा?
ललित : अरे जब ये आपकी पत्नी
ही नहीं रहीं,
तो आप अपना प्राविडेंट फंड
इन्हें क्यों देना चाहेंगे?
कोई भी भला आदमी क्यों देना चाहेगा?
रामलुभाया : अरे आप ही ने तो कहा था कि यदि ये किसी और पुरुष से विवाह करना
चाहेगी तो ही तो मुझ से तलाक लेगी न ...
दमयंती : अजी कैसी बेकार की बातें कर रहे हो। बच्चे सुनेंगे तो क्या
कहेंगे। सरा समाज थू थू करेगा। मुझे तो तुम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं
छोड़ोगे।
रामलुभाया : तू चुप बैठी रह। पहले मुझे इस से निबट लेने दे।
माया : (प्रवेश करती है। उसके हाथ में कुछ फाइलें हैं। आश्चर्य से देखती
है)
अरे ये लोग अभी यहीं हैं। इनका काम नहीं हुआ?
रामलुभाया : सरकारी दफ्तर में कभी कोई काम जल्दी हुआ भी है।
माया : मुझे भी लग रहा था कि यहाँ कोई रोचक नाटक चल रहा है।
ललित : नाटक नहीं,
काम चल रहा है। तुम अपनी बात कहो,
क्या करने आई हो?
माया : (इठला कर)
कुछ पत्रों पर बड़े बाबू के ऑटोग्राफ चाहिएँ।
ललित : लाओ!
(माया उसके सामने कागज रखती है और वह उन पर हस्ताक्षर करता चलता है। माया
कागज समेट कर चली जाती है। किंतु दर्शक स्पष्ट देख सकते हैं कि वह बाहर खड़ी
हो गई है,
ताकि उनकी बातें सुन सके।)
ललित : हाँ?
हम क्या बात कर रहे थे?
हाँ! यदि ये किसी और पुरुष से विवाह करना चाहें तो भी आप अपना प्राविडेंट
फंड इन्हें ही देना चाहेंगे?
रामलुभाया : वह दूसरा जना,
जिससे यह ब्याह करना चाहेगी,
इसे ऐसे ही डोली में बैठा ले जाएगा क्या?
कुँवारी छोरी से तो कोई बिना दहेज के ब्याह करता नहीं,
इस छोड़ी हुई से वह बिना दहेज के विवाह कर लेगा क्या?
ढेर सारा दहेज माँगेगा। ढेर सारा। छोड़ी हुई से विवाह करने पर तो कुँवारी से
विवाह करने वाले से भी अधिक दहेज मिलना चाहिए। ...
ललित : दूसरे विवाह के लिए तलाक तो प्रेम के कारण होता है। वह प्रेम विवाह
होगा,
तो वह दहेज कैसे माँगेगा?
रामलुभाया : अरे प्रेम तो यह करेगी न उससे। नहीं तो मुझ से तलाक क्यों
लेगी। वह ससुरा थोड़ी इससे प्रेम करेगा। वह तो दहेज के लिए विवाह करेगा।
ललित : तो?
रामलुभाया : यह रोएगी,
धोएगी,
प्रार्थना करेगी। हाथ जोड़ेगी। पर उस आदमी का मन थोड़ी पसीजेगा। नहीं
पसीजेगा। किसी का नहीं पसीजता।
दमयंती : क्या बके जा रहे हो जी?
मैं कोई तलाक नहीं ले रही,
न मुझे इस बुढ़ापे में किसी और से विवाह करना है।
रामलुभाया : अरे तू चुप कर। मैं जानता हूँ,
जवान होती,
तब भी न करती। पर,
अभी इससे निबट लेने दे। सरकारी कागज हैं,
जाने क्या लिख दे।
ललित : तो क्या लिखना है फार्म में?
रामलुभाया : पहले बात का फैसला तो हो लेने दो बड़े बाबू ! फिर फारम भी भर
लेंगे।
ललित : (सिर खुजलाता है)
बोलो।
रामलुभाया : जवान होती,
कुँवारी होती |