| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.03.2008 |
|
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता |
|
वह महिला,
थानेदार के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। थानेदार की आँखों में चेतावनी थी
कि वह अक्षम्या अपराध कर रही है। कोई अपनी इच्छा से थानेदार के सामने बैठने
का साहस कैसे कर सकता है। ... किंतु महिला अनपढ़ थी। उस भाषा को पढ़ नहीं
सकी। बोली,
“मेरा
नाम तस्ली़मा नसरीन है।”
“तो
अचार डालूँ उसका?”
“नहीं।
आपको वह कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। अचार तो वे डालेंगे,
आपके देश का।”
“कौन?”
“जो
मेरा सिर माँग रहे हैं।”
'क्या
करेंगे आपके सिर का?
यह
कोई गोभी का फूल तो है नहीं कि इसे पका कर खाएँगे।”
“रसोई
से बाहर निकल थानेदार।”
महिला ने कहा,
“मैं
अपराध जगत् की बात कर रही हूँ। उन्होंने मेरी हत्या की सुपारी दी है। वे
मेरा सिर लाने वाले को घोषित रूप से पुरस्कृत करने की घोषणा कर रहे हैं।”
“देखो
मैडम।”
थानेदार बोला,
“यदि
किसी साधारण व्याक्ति ने सुपारी दी है,
तो
हम अभी उसे हथकड़ी पहना कर सीखचों के पीछे धकेल देंगे;
किंतु ...”
“किंतु
क्या?
कानून तो सबके लिए एक होता है।”
“नहीं।
हमारे यहाँ आरक्षण का प्रचलन है। कुछ लोग कानून से आरक्षित हैं। वे जब
चाहें,
कानून का सिर माँग सकते हैं। वे कानून की हत्या की भी सुपारी दे सकते हैं।”
“कौन
लोग हैं?”
“कांग्रेस
पार्टी। हमारे प्रधान मंत्री। हमारे शासक।”
“किंतु
मेरा सिर तो कुछ मुस्लिम संगठन माँग रहे हैं। उसमें कांग्रेस का कोई हाथ
नहीं है।”
“माँग
तो मुस्लिम संगठन ही रहे होंगे;
और
अपने धर्म के नाम पर माँग रहे होंगे। किंतु उन्हें ये माँगें कांग्रेस
सरकार ने परोसी हैं;
और
यह सब माँगने का साहस भी कांग्रेस सरकार ने ही दिया है। अफ़ज़ल को माफी न
दी जाए,
यह
माँग किसकी है?”
“कांग्रेसी
मुख्येमंत्री की।”
“उसकी
फाइल किसने रोक रखी है?
एक
दूसरी कांग्रेसी मुख्यभमंत्री ने। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह मानते हैं
कि सिख शक्तियों ने मुगलों से लड़ कर अच्छा नहीं किया,
इसलिए वे उसकी क्षतिपूर्ति कर रहे हैं। वे मुगलों का राज्य लौटा देना चाहते
हैं।”
“कैसे?”
“उन्हें
केवल मुसलमानों को शिक्षा देने की चिंता है। शिक्षा नहीं,
तालीम। हिंदी या भारतीय भाषाओं में नहीं,
उर्दू में। ...”
“क्यों?”
“ताकि
इस देश के मुसलमानों और अन्य धर्मावलंबियों की भाषा कभी भी एक न हो सके। वे
हिंदुओं से पृथक और दूर रहें।”
“पर
क्यों?”
तस्लीमा नसरीन ने पूछा,
“हमने
बांगलादेश में उर्दू का विरोध किया था।”
“तुम्हारे
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह नहीं थे न। न शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह थे। न
वहाँ सोनिया गांधी जैसी कोई महाशक्ति थी।”
थानेदार ने कहा,
“मनमोहन
सिंह चाहते हैं कि शिक्षा केवल मुसलमानों को दी जाए। वे शिक्षित हो जाएँ तो
नौकरियाँ केवल उनको ही दी जाएँ। उनके लिए नौकरियों का आरक्षण भी हो चुका
है। उन्हें मकान बनाने के
लिए,
व्यापार करने के लिए तथा अन्य कामों के लिए धन भारत सरकार दे। ...”
“पर
तुम्हारी सरकार तो सेकुलर है। भारत इस्लामिक देश नहीं है। फिर यह सब क्यों?”
“हमारे
देश में सेकुलर का अर्थ इस्लामिक ही होता है।”
थानेदार मुस्कराया,
“कांग्रेस
एक पाकिस्तान
1947
ई. में बना चुकी है। कश्मीर को भी व्यवहारत: इस देश से काट ही चुकी है।
उसका मन भरा नहीं है। वह आसाम को भी भारत से पृथक करके ही दम लेगी। और तब
तक नए पाकिस्तान बनाती ही चली जाएगी,
जब
तक यह सारा देश पाकिस्तान नहीं बन जाएगा।”
“यहाँ
भी पाकिस्तान बन जाएगा?”
“प्रयत्न
तो यही है।”
“तो
इसीलिए वे मुझपर आक्रमण करने का साहस कर रहे हैं,
मेरा सिर माँग रहे हैं?”
“अब
आप ठीक समझीं।”
थानेदार मुस्कराया,
“यह
तो सरकार के एजेंडे पर है।”
“मैं
तो समझती थी कि मैं यहाँ सुरक्षित हूँ।”
तस्लीमा घबरा गईं।
“आप
सुरक्षित हैं मैडम।”
थानेदार बोला,
“वे
लोग आपका सिर ही तो माँग रहे हैं। मनमोहन सिंह कब से अपना सिर उनके चरणों
में डाल चुके हैं। वे तो स्वयं को सुरक्षित ही मानते हैं।”
“मैं
तो सोच रही थी कि मैं प्रधानमंत्री से अपनी सुरक्षा की गुहार करूँगी।”
“आपकी
सुरक्षा !”
थानेदार बोला,
“दैट
इज़ नो प्राब्लम। उसका प्रबंध हो चुका है।”
“सच?”
“हाँ।
उनका आदेश आ चुका है कि आपके विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज कर आपको हवालात में
डाल दिया जाए।”
“इसका
क्या अर्थ हुआ?”
तस्लीमा चौंक कर उठ खड़ी हुईं।
“हवालात
में आप पुलिस सुरक्षा में हैं। कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। बहुत से
बहुत वे आपका सिर माँग लेंगे। वह हम उनको दे देंगे। शेष आप सारी की सारी
सुरक्षित हैं।”
“और
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता?”
“वह
आपको प्राप्त है,
यदि अल्पसंख्यक आयोग आपको उसकी अनुमति दे और कट्टरपंथी मुल्लाओं को उसमें
कुछ आपत्तिजनक न लगे।”
“यह
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कॉपी राइट,
भारत के संविधान से छीन कर,
उन्हें किसने दे दिया?”
“हमारी
महान् भारत सरकार ने।”
थानेदार हँसा,
“अच्छा
आइए,
आपकी सुरक्षा का प्रबंध कर दूँ।”
थानेदार ने हथकड़ी अपने हाथ में ले ली;
और
कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|