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11.18.2008
 

सुबह
नन्दलाल भारती


सोचता हूँ,कल सुबह सकून से सुनूँगा
पक्षियों के चहकने का सप्त सुर ।
पोखरों में वनमुर्गियों का कलरव,
बंस के झुरमुटों से महोखो का स्वर ।
जंगल की हरियाली घास पर ओस,
भरे तालाब पोखरे आँख भर देखूँगा ।
विषमताएँ - ना रहें उत्पीड़न क्रन्दन
संघर्षरत आम आदमी की पीड़ा,
कल नहीं बिल्कुल नहीं होगी ।
क्योंकि कल पूर्ण समानता का सम्राज्य होगा ।
जंगल होगा आबाद,
जीव जन्तुओं का संगीत निशा होगी ।
एकता समानता का आलम होगा,
भुखमरी गरीबी कल नहीं होगी
मैं बहुत खुश होऊँगा सफलता पर ।
कल बूढ़े बरगद की छाँव,
खुशमिजाज चिन्तनशील बैठूँगा ।
वो सुबह कब आयेगी भारती आज मैं डरा सहमा,
बम की भिभीषिका की आशंका में,
लोगों के पूर्वाग्रहों से घिरा भारती,
अपने ही लोगों के बुने मकड़ जाल में ,
दुर्भाग्यवश संघर्षरत,
कल की नयी सुबह की इन्तज़ार में ।


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