अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
03.08.2007
 

वो मैं तो नहीं

मंगला रामचंद्रन


 

निर्मला पति के साथ जब इस शहर में रहने आई तो ना मायके का घर रह गया था न मायके के लोग। वो छोटा खूबसूरत शहर अब इतना विस्तार पा चुका था कि महानगर की छाया लगने लगा।  माता पिता का घर जब था वो पुराने शहर के छोर पर था और निर्मला नये शहर के दूर के छोर पर रह रही है। कहने को मायके का शहर ही कहलायेगा। यहीं बचपन बीता पढ़ाई की यहीं से विवाह हुआ। कुछ समय तक पुराने दिनों की यादों के झरोखों से वर्तमान के खाँचों में चित्र को बैठाती रही थी। बहुत जल्दी समझ आ गया कि वर्तमान खाँचों में अतीत की यादों का कोई मेल नहीं। बस फिर जीवन अपनी रफ्तार से चलने लगा था।

 

कभी कभाध में बाबूजी के, भैया दीदी के परिचित मिल जाते आत्मीय बात होती। तब लगता हाँ यह अपना ही शहर है। पर ऐसा बहुत कम बहुत ही कम बार हुआ होगा। उसके स्वयं के सहपाठियों में से बस यश एक बार मिला था। दोनों ही जल्दी में थे सो फोन पर बाद में बाते करने का तय कर फोन नंबर का लेनदेन भर हुआ। यश ने अवश्य दो तीन बार फोन किया पर निर्मला खास उत्साहित नहीं लगी। निर्मला के लिये तो यही शहर मानों अपरिचित से धीरे-धीरे परिचित होने जैसा था।

पर पिछले चंद महिनों में कुछ ऐसा हुआ कि निर्मला को शहर अपना सा लगने लगा। एक दिन सरला का फोन आया। निर्मला ने फोन पर कह दिया  कौन सरला

दूसरी तरफ से हँसी के साथ उलाहना भरी आवाज़ आई,   कितनी निष्ठुर है तू निर्मला मुझे भूल भी गई। मेरे बालों पर तरह तरह के जूड़े बनाने की कोशिश में बालों का सत्यानाश कर दिया करती थी। अब पूछती है कौन सरला।

अरे सरला तू मुझे कैसे मालूम कि तू भी यहीं है और फोन करेगी?   निर्मला आश्चर्य से जकड़ी हुई थी सो अधिक बोल नहीं पाई।

मन में इच्छा भी तो होनी चाहिये। तू यहाँ बस गई पर किसी की खबर ली क्या? मैं चार दिनों के लिये आई हूँ और पता लगा लिया कि अब तू इसी शहर की हो गई। अब ये मत पूछ कि मुझे कैसे पता चला। समय बहुत कम है कल हम सब पैगोडा में मिल रहे हैं। तू भी एक बजे तक पहुँच जा लंच लेंगे और एक दूसरे की खबर भी।

हम सब? सब का मतलब हमारे साथ के बाकी लोग भी हैं क्या? निर्मला ने संदेह भरी आवाज़ में पूछा।

हाँ, यार सुलेखा, हमीदा, चरण, मैं और तुम और लड़कों में यश, नरेन, चेतन और ऽऽऽ  । ठीक समय पर पहुँच जाना कोई बहाना मत करना। सरला ने फोन काट दिया।

निर्मला तो सुखद आश्चर्य के समुद्र में गोते लगाने लगी। सरला की आवाज़ में स्कूली दिनों का जोशो खरोश बरकरार था। पर उसको मेरा फोन नम्बर कहाँ से मिला होगा एक बार सरला की बात पर गौर किया उसने किस किस का नाम लिया था  यश का नाम आते ही समझ गई। अब कल पैगोडा जाती है तो क्या बातें होगी या हो सकती हैं। निर्मला तो स्कूल के बाद किसी लड़के से मिली ही नहीं। लड़कियों से तो फिर भी कुछ से मिली थी।

स्कूल के दिनों में लड़कियाँ हँसी मज़ाक में लड़कों के साथ जोड़ियाँ बनाती। जहाँ निर्मला की बारी आती तो सब एक मत हो जाती।  इस दब्बू गूँगी गुड़िया के लिए ज्ञानू सबसे ठीक रहेगा। जहाँ रूद्र का नाम आता सब अपने नाम के साथ जोड़ी बनाती। कक्षा का जीनियस  स्मार्ट समझदार मिस्टर परफेक्ट के साथ मैं मिस परफेक्ट ही बढ़िया पेयर बन सकते हैं। सरला, रमोला, सुलेखा, हमीदा अधिकतर सभी लड़कियाँ स्वयं को उसके नाम से जोड़तीं। खूब हँसी मज़ाक करतीं शोर शराबा होता फिर बेल बजते ही सब कक्षा की ओर दौड़ पड़तीं। उन लोगों की वो दिल्लगी वो शरारत वह पेड़ के नीचे अगले दिन के इंतज़ार में पड़ी रहतीं।

अपना नाम ज्ञानू के नाम के साथ जोड़े जाने से खिन्न निर्मला कक्षा में भी गुमसुम ही रहती। उसकी इच्छा होती कि उसका नाम भी रूद्र के नाम के साथ जोड़े। पर निर्मला ने उन लोगों की तरह ये बात कभी अपने मुँह से कह कर ज़ाहिर नहीं किया। बाद में देर से ही सही, निर्मला समझ गई कि इस तरह नाम जोड़ कर जोड़ी बनाना मात्र मनोंरजन और टाईमपास का तरीका था।

सरला ने फोन पर अगले दिन आने वालों के नाम गिनाते हुए और ऽऽ खींच कर वाक्य को मानों जानबूझ कर अधूरा छोड़ दिया। निर्मला के लिए तो दुविधा या भ्रमपूर्ण स्थिति का निर्माण हो गया। सरला ने कहीं जान बूझ कर वाक्य को यूँ खींचा तो नहीं। हो सकता है उस और में ही रूद्र हो। विवाह के इतने वर्षों बाद कॉलेज जाते दो बच्चों की माँ होने को बावजूद रूद्र का नाम लेकर निर्मला विचलित क्यों हो गई। स्कूल के बाद तो कभी इनमें से किसी को खास याद ही नहीं किया था। फिर रूद्र के प्रति ये आसक्ति आखिर क्यों?

अगले दिन पैगोडा में अपने सहपाठियों को ढूँढना नहीं पड़ा। एक बड़ी गोल मेज के ईर्द-गिर्द बैठे जिस तरह शोर मचा रहे थे वो स्कूल के दिनों में उस पेड़ के नीचे होते शोर से किसी तरह कम नहीं था। फोन पर सरला ने जो जो नाम कहे थे, वे सब थे पर वो और ऽऽ नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि निर्मला रूद्र से मिलने या उसे देखने ही वहाँ आई हो। उसे तो आना ही था। स्कूल छोड़ने के बाद अपने जीवन में घटित खास घटनाओं की चर्चा चल रही थी साथ ही जो अनुपस्थित थे उनकी बातें भी बीच-बीच में होती जा रही थी।

पता है रूद्र ने आखिर शादी कर ही ली। -यश बोल रहा था।

कब तक कुँवारा बैठा रहता। सुना है कि उसकी मम्म बहुत बीमार हो गई थी और उनकी ज़िद्द पर ही वो विवाह के लिए तैयार हुआ।-चरण अपनी तरफ से जानकारी दे रहा था।

कुछ भी कहो थोड़ा सनकी मेरा मतलब झक्की तो वो पहले भी था। अब देखो इतनी बढ़िया नौकरी छोड़ कर कोई जंगल की खाक छानता है भला वन्य जीवन का वन्य जातियों का अध्ययन कर रहें हैं जनाब।  नरेन ने कुछ चिढ़ते कुछ चिढ़ाते हुए अंदाज़ में कहा।

वो तो रूद्र की बीवी इतनी सक्षम है कि घर परिवार नौकरी सबको अकेले ही मैनेज कर लेती है वरनाऽऽ, यश ने आगे ये और जोड़ दिया  जीनियस लोगों की बातें कुछ अलग ही होती हैं।

मैने तो ये भी सुना था कि रूद्र किसी लड़की को चाहता था। देर तक विवाह न करने का एक कारण वो लड़की भी थी। सरला ने काफी देर बाद मुँह खोला।

निर्मला तो उन सब की इतनी सारी जानकारीयों से हैरान थी । उसे क्यों किसी के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है।

तभी यश ने बात के सिरे को पकड़ कर आगे कहा -  बात सही है वो किसी सीधी सादी लड़की को चाहता था। उसे बनावटी तौर-तरीकों वाली या नखरे वाली लड़कियाँ सख्त नापसंद थी।   

सभी ने चौंक कर पूछा, कौन थी यार वो लड़की जल्दी बता ना।

एक सेकन्ड सोच कर यश बोला, उसकी शादी जल्दी हो गई और रूद्र उसे बता नहीं पाया।

सबकी उत्सुक प्रश्न भरी निगाह यश पर टिकी हुई थीं। सो शीघ्रता से बात खत्म करते हुए बोला, उसका नाम पता तो मुझे भी नहीं मालूम।

सबके चेहरे पिन चुभाये गुब्बारे से पिचक गये।

निर्मला को लगा कि यश उस लड़की के बारे में जानता है पर बताना नहीं चाहता था। एक पल को उसके मन में ख्याल आया वो लड़की कहीं मैं तो नहीं?

 मन ही मन हँस दी।

पुराने सहपाठियों से मुलाकात को कुछ दिन तक जुगाली करने के पश्चात निर्मला अपने पुराने ढर्रे पर लगभग आ गई थी। तभी पिछले सप्ताह रूद्र अचानक  अप्रत्याशित तरीके से ना जाने कहाँ से प्रकट हो गया।

मुझे पहचान तो लिया ना? आज भी वही समझदार गंभीर हावभाव और भेदती नज़र वाले रूद्र का सामना होते ही पहला प्रश्न था निर्मला से।

यूँ अचानक उसे देखकर निर्मला खड़ी की खड़ी रह गई। क्या करे क्या कहे कुछ समझ ही नहीं आया।

निर्मला तुम तो अभी भी वैसी ही हो गूँगी गुड़िया।  मैंने तो सोचा था अब तक वाचाल हो गई होगी। खैर अब क्या बैठने को भी नहीं कहोगी, चलो मैं खुद ही बैठ जाता हूँ।   कहते हुए रूद्र बैठ गया।

तुम भी कहाँ बदले हो बस सिर के कुछ सफेद बालों को छोड़ कर। मैं यहाँ हूँऽऽ या घर का पता कैसे लगा  शायद ऽऽ

निर्मला अटक-अटक कर बोल रही थी। रूद्र ने बीच में ही बात काट दी, हाँ, यश ने ही बताया। तुम सब पिछले महिने पैगोडा में मिले थे।

निर्मला अब तक सहज हो चुकी थी।   

तुम उस दिन आये क्यों नहीं?

मै यहाँ था ही कहाँ दो दिन पहले तो आया ह और दो दिन बाद जा रहा हू यहाँ से हमेशा के लिये। पता लगा तुम यहीं हो जाने से पहले एक बार तुम्हे देखने के लोभ से बच नहीं पाया।  रूद्र को लगातार इतना बोलते हुए निर्मला ने कभी नहीं देखा था। छोटे छोटे वाक्य में उत्तर देने की आदत थी उसकी।

दोनों ने साथ कॉफी पी कुछ पुरानी कुछ नई बातें की। रूद्र अचानक ही खड़ा हो गया  जाने से पहले कई काम निपटाने हैं सो अब जाना होगा। जाने से पहले एक काम करने की तुमसे इजाजत मिलेगी क्या?

निर्मला नासमझ की तरह उसे देखने लगी।

घबराओ नहीं बस एक बार तुम्हारे हाथ का स्पर्श करना चाहता हूँ हाथ मिलाओगी?     रूद्र ने निर्मला की ऑंखों में सीधे झाँकते हुए कहा।

हाँ, हाँ क्यों नहींऽऽऽऽ  

निर्मला स्वयं चकित थी कि इतनी सहज कैसे बनी रही।

रूद्र चला गया और निर्मला उसके कथन का मंथन करते हुए विभिन्न अर्थ निकालने में लगी हुई थी। शायद रूद्र उसकी छूअन के एहसास को महसूस करना चाहता था। उस दिन पैगोडा में यश ने जिस सीधी सादी लड़की का ज़िक्र किया था वो मैं तो नहीं?    निर्मला के दिलो दिमाग पर मैं तो नहीं का जाप छा गया। इन बातों का अब कोई अर्थ नहीं ये तो निर्मला भी समझती है। पर फिर भी इस कल्पना ने उसे कहीं से गुदगुदाया। लगा जीवन में अनायास ताज़ा हवा का झोंका आया हो जिसे वो लम्बी लम्बी साँसे लेकर महसूस करना चाहती है। लगा तो उसे ये भी कि वो सीधी सादी लड़की वो ही है।