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ISSN 2292-9754

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07.12.2014


कुंभ का वनवास

हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर आदमियों के मेले में दूसरे और तीसरे प्लेटफार्म पर मैं मेरी पत्नी प्रेरणा हम दोनों अपनी नज़रों को हर महिला के पल्लू के किनारे से भीतर उसके चेहरे पर टिकाते हुए और उम्मीद के साथ घबराते कदमों को आगे बढ़ा रहे थे। मन अजीब और बेचैन करने वाली कल्पनाओं के सागर में गोता लगा रहा था। मगर हमने भीड़ में बिछुड़कर छूटने के डर एक-दूसरे का हाथ पकड़ रखा था। तेज़ कदमों से आगे बढ़ते वक़्त बीच-बीच में उसके चेहरे पर नज़र जाती, तो उस पर बेचैनी के साथ आत्मविश्वास जैसा कुछ नज़र आता। मैं भी उसके इस विश्वास को अपने साथ जोड़कर मन को तसल्ली दे लेता। मगर दोनों के मन भीतर से बुरी तरह बैठे हुए थे। शादी की सालगिरह से चार दिन पहले इस तरह हरिद्वार आना पड़ेगा, हमें कल्पना ही नहीं थीं। हालाँकि थोड़े दिन पहले मित्रों के साथ कुंभ के मेले में जाने की मंशा तो थी, मगर योजनाएँ ही बनाते रहे। मगर मन के शब्दों की अपनी यात्रा होती है। वे कहाँ तक पहुँचते हैं, कौन जानता है। इलाहाबाद जाने के लिए प्लेटफार्म संख्या दो पर खड़ी रेलगाड़ी में यात्रीगण सीटों को सुरक्षित करने के लिए ठेलमठेल कर रहे थे। इस ठेलमठेल के बीच में भी मेरी एक नज़र ट्रेन की खिड़कियों को घुस कर कोई जाना-पहचाना चेहरा तलाश रही थी। संक्रांति के गंगा स्नान का भारतीय जन में कितना महत्व है, इस बात का अंदाज़ा इससे लग जाता था कि हम प्लेटफार्म ग्रामीण परिवेश के महिला-पुरुष और बच्चों के कपड़ों, सामानों और उनके बदनों से लगभग रेंगते हुए जैसे-तैसे अपने की खोज कर रहे थे। मन की बैचेनी में एक ही नज़र में पूरा प्लेटफार्म नापने की कई बार कोशिश की, मगर वहाँ सभी एक जैसे ही नज़र आते। ग्रामीण महिलाओं के पहनावे में बहुत ज़्यादा फर्क कहाँ नज़र आता है। लगभग एक जैसे रंग की धोतियाँ, सामान और थैले होते हैं। ऐसे में माँ को पहचानने के लिए मैं ईश्वर से नई दृष्टि की गुहार लगा रहा था। गुहार क्या लगा रहा था, भीख माँग रहा था। कई बार मन सोचने लगता कि अचानक से सामने माँ आ गई, और मैं उनसे गले लिपट रहा हूँ। ऐसी कल्पनाएँ मैं दिल्ली से लेकर हरिद्वार के रास्ते में भाड़े की गाड़ी में बैठा-बैठा असहाय मन से करता रहा। असहाय मन और कर भी क्या सकता है।

दिल्ली से हरिद्वार तक का लगभग ढाई सौ किलोमीटर का सफ़र गाड़ी ने पूरे दस घंटे के मन और मस्तिष्क को रौंध देने वाले लंबे इंतज़ार में तय किया। शायद यह सच है कि जब ऊपरवाला मन का इम्तहान लेता है, तो तमाम विपरीत हालात आस-पास पैदा कर देता है। या हो सकता है हमें ही ऐसा लगता हो, ईश्वर पर सिर्फ आरोप लगाते हों। मगर मेरे लिए मन को काबू में रखना बहुत मुश्किल था। मैं माँ की हालत के बारे में सोच-सोच कर परेशान था। कहाँ होगी, कैसी होगी। पिछले पंद्रह घंटे से क्या कर रही होगी? क्या उसने कुछ खाया होगा? न तो वह फोन कर सकती है और न ही वापिस आने का रास्ता जानती है। दिल्ली से हम शाम सात बजे चले थे, सोचा था कि ज़्यादा से ज़्यादा ग्यारह बजे तक हरिद्वार पहुँच कर माँ की खोज-खबर लेंगे। पुलिस की मदद लेंगे या फिर अखबार में एक-दो जानकार मिल गए थे, उनसे कुछ मदद लेंगे। मगर ग्यारह से बारह, फिर रात के एक से दो बजने लगे। घड़ी में बढ़ते घंटे मन को और लगातार बेचैन कर रहे थे। टाटा इंडिका का ड्राइवर पहली बार हरिद्वार जा रहा था। न तो उसे रास्ते के बारे में जानकारी थी और न ही हमें। वह गाड़ी को भी तेज़ी से नहीं चला पा रहा था। शायद नए रास्ते और रात से डर रहा था। बीच में रुककर एक दुकानदार से पूछा, हरिद्वार और कितनी दूर होगा, तो उसने बताया कि, बस और तीस-पैंतीस किलोमीटर आगे। सुनकर मन को थोड़ी तसल्ली आई। अब रात के लगभग ढाई बज चुके थे। उम्मीदों की लौ लगाए बैठी प्रेरणा ने मन को तसल्ली दी, जल्दी पहुँच गए, तो रात में माँ ढूँढना आसान होगा। सब सो रहे होंगे। ऐसे में ढूँढना आसान होगा। शायद यह उसकी कल्पना ही होगी।

पूरी रात गाड़ी में सफ़र के दौरान सिर्फ एक पानी की बोतल हमारा सहारा थी, जिसमें से पाँच-छह घूँट प्रेरणा ने और इतने ही मैंने लिए होंगे। रास्ते में औपचारिकतावश भी ड्राइवर से उसके खाने के लिए पूछने की हिम्मत नहीं हुई। शायद वह हमारी तड़फ को समझ पा रहा था। मैं बैठा-बैठा दोहरा होकर लगातार ईश्वर से माँ की कुशलता की प्रार्थना कर रहा था। मुझे लगातार बेहाल देख वह मुझे अपने पैरों पर सुलाने की कोशिश करती, मगर पलक लगते ही अजीब से ख़ायाल आने लगते।

कल शाम में और आज रात के ढाई बजे में कितना फर्क आ गया था। वक़्त कितना बेदर्द होता है, ऐसा पहली बार महसूस किया। कितने मज़े से कल शाम लोदी गार्डन घूमने की योजना बना रहे थे। प्रेरणा पिछले कई दिनों से लोदी गार्डन जाने के लिए कह रही थी। मगर हमेशा कोई न कोई बात हो जाती, और लोदी गार्डन जाना निरस्त कर देते। कल बड़ी मुश्किल से जाने के लिए तैयार ही हुए थे, कि जयपुर से भाई का फोन आ गया।

भाई का फोन यही सोचकर उठाया था कि हाल-चाल जानने के लिए होगा। जैसा अक्सर दूसरे दिनों में होता था। मगर यह दिन आम दिनों जैसा नहीं था। भाई ने घबराहट में कहा, पिताजी तुझसे बात करना चाह रहे हैं, और एक अनजाना सा नंबर मुझे लिखवा दिया। मैंने पूछा भी क्या बात है, मगर उसको भी इस मामले में पता नहीं था। मैंने सोचा, पिताजी तो हरिद्वार गए हुए हैं। उनके पास मोबाइल भी नहीं है, फिर अचानक उनका फोन कैसे और क्यूँ आया। भाई की घबराहट ने मन में शंकाओं के बादल बना दिए। मैंने भाई के बताए उस मोबाइल पर फोन करने की कोशिश की, मगर फोन नहीं लगा। थोड़ी देर बाद फिर से भाई का फोन आया। मगर इस बार मैंने उसकी आवाज़ में एक अनजाना सा भय और बैचेनी को साफ महसूस किया। भाई ने कहा-पिताजी तुमसे अभी बातचीत करना चाह रहे हैं, और फिर वही नंबर लिखवा दिया। मैंने पूछा, बात क्या है?तो वह सिर्फ इतना बोल पाया कि, वे किसी बड़ी विपदा में हैं और तुझसे अभी बात करना चाह रहे हैं। मुझे कुछ भी समझ नहीं आया। मन एकदम खाली हो गया। विपदा सुनते ही चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगीं। उल-जूलूल कल्पनाएँ मन को घेरने लगीं। किसी अनहोनी के डर से मैं बुरी तरह व्याकुल सा हो गया। शायद डर के भाव मेरे चेहरे पर तैयार हो रही प्रेरणा को नज़र आ गए थे। उसने पूछा, क्या बात है? मैंने कुछ भी छिपाए बिना बता दिया कि हरिद्वार में पिताजी किसी बड़ी विपत्ति में हैं। मेरे मना करने के बावजूद पिताजी-माताजी हरिद्वार कुंभ मेले में यह कह कर चले गए कि चारों धाम की यात्रा के बाद कुंभ की यात्रा करना ज़रूरी है। उनकी पारंपरिक मान्यता के आगे मैं भी कुछ नहीं बोल सका। फिर यह भी पता था कि उनके साथ गाँव के और भी बीस-बाइस लोग हैं। इसलिए चिंता करने की तो कोई बात ही नहीं है। मगर अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। इत्तेफाक से तुरंत भाड़े की गाड़ी का इंतज़ाम हो गया।

मैंने तुरंत उस मोबाइल नंबर पर फिर से कोशिश की और इस बार मैं सफल रहा। उस अनजाने झारखंड के श्रद्धालु यात्री से बात हुई तो उसने तुंरत पिताजी को फोन दे दिया। मैंने हिम्मत करके पूछा,

पिताजी, क्या बात है। लगभग निढाल और टूटती सी आवाज़ में उन्होंने कहा - बेटा, तेरी माँ सुबह की खोई हुई है, अभी तक नहीं मिली। तू, जल्दी आ जा। उस वक़्त मेरे मन में हज़ारों सवाल थे, जिन्हें मैं पूछना चाहता था। मगर उन्होंने सिर्फ यह कहकर कि मैं स्टेशन के अहाते में बने शिवलिंग के पास ही तेरा इंतज़ार करता मिलूँगा, फोन काट दिया। उसके बाद उस मोबाइल पर मैंने दसियों बार फोन करने की कोशिश की, मगर फोन नहीं लगा। एक अखबारी मित्र के सहारे हरिद्वार के एक समाजसेवी को फोन लगाया, तो उसने मेरी बात खोया-पाया विभाग में करवाई। मगर खोया-पाया विभाग में रिपोर्ट लिखने वाले महोदय की बात सुनकर दिल को गहरा धक्का पहुँचा, 'नाम क्या है......उम्र बताओ, सर पैंसठ साल,....वह बड़बड़ाने लगा, मगर मैं उसको साफ सुन पा रहा था...इसीलिए माँ-बाप को कुंभ के मेले में छोड़ जाते हैं'। उस समाजसेवी सज्जन ने अपना परिचय देकर उसे फटकारा और मुझे पूरी मदद का आश्वासन दिया।

.........और पच्चीस-तीस किलोमीटर चलने के बाद लगा कि अब हरिद्वार आ गया। अब तक सुबह के चार

बज गए थे। मैंने आँखें खोलकर खिड़की से बाहर झाँक कर देखने की कोशिश की, रात अभी बाकी थी। थोड़ा और आगे चलकर एक चौराहे पर ट्रैफिक वाले से पूछा कि हरिद्वार का रास्ता कौन सा है और कितनी दूर होगा। उसका जबाव सुनकर दिल धक् से बैठ गया। "यहाँ से बायें तरफ मुड़कर सीधे जाना है...लगभग पचपन-साठ किलोमीटर और होगा"। अब मेरी चिंताएँ बढ़ने लगीं। सुबह होने पर माँ को ढूँढना बहुत मुश्किल हो जाएगा। लोग गंगा स्नान के लिए दौड़ रहे होंगे। रेलगाड़ी में चढ़ रहे होंगे। माँ भी शायद सुबह तक भी अपने आसपास किसी अपने को न पाकर कहीं इधर-उधर न चली जाए। पिता की हालत के बारे में सोच-सोच कर मन ख़ुद को दुखी कर रहा था।

मगर भोर होने से पहले हमने हरिद्वार में दस्तक दे दी थी। सुबह लगभग साढ़े पाँच बजे जैसे-तैसे हमने हरिद्वार में प्रवेश किया। गंगा माँ को प्रणाम किया और उनसे माँ-पिता को हिम्मत देने और हमारी मदद करने का आशीर्वाद माँगा। स्टेशन के पास पहुँच कर सबसे पहले पिता द्वारा बताए शिवलिंग की मूर्ति को ढूँढना शुरू किया। स्टेशन दो-तीन वर्गकिलो मीटर के दायरे में सिमटा। श्रद्धालुओं की हज़ारों की तादाद में स्टेशन के ओर-छोर का पता नहीं चल रहा था। शिवलिंग को ढूँढने में ज़्यादा मुश्किल नहीं हुई। बीस-बाइस घंटे से बिना कुछ खाए-पिए, थके और टूटे हुए पिता को देखकर मन पर भारी बोझ सा पड़ गया। अब ईश्वर से प्रार्थना और तेज़ हो गई थी। यदि माँ को कुछ हो गया....तो ये इस पाप को बची ज़िंदगी कैसे ढोएँगे। मैंने पहली बार अपने दृढ़ पिता को घायल अवस्था में देखा। उनकी आँखों में आँसू मैं दूसरी बार देख रहा था। इससे पहले, पहली बार उनकी आँखों में आँसू दादी की मौत पर देखे थे। मगर इस बार आँसुओं के साथ उनकी आँखों में खोने का ग़म, डर और पश्चाताप साफ नज़र आ रहा था।

पिछली पूरी रात से उनके पेट में अन्न का एक कोर तक नहीं गया। थके और लाचार पैरों की मदद से माँ की तलाश के लिए उन्होंने पूरे स्टेशन के तीन-चार चक्कर भी लगाए। सुबह से लेकर दोपहर, फिर शाम तक बराबर स्टेशन के अहाते के बाहर के मुख्य दरवाज़े पर इसी उम्मीद पर टकटकी लगाए रखी कि, कहीं वो नज़र आ जाए। एक दो बार गुमशुदा की तलाश में आवाज़ लगाने के काउंटर पर लाइन में लगने की कोशिश भी की, मगर बिछड़ों की लंबी लाइन को देखकर लाचार पैर विवश हो गए। शाम को जब भूख सताने लगी, तो पास की एक दुकान पर यह सोचकर कि थोड़ा कुछ खा लूँगा, चले गए। मगर पता नहीं क्या सोचकर फिर से आ गए। कुछ भी नहीं खाया गया। शाम को एक चाय पीकर तसल्ली कर ली। स्टेशन की कड़कड़ाती ठंड में ओढ़ने और बिछाने के लिए सिर्फ एक तौलिया ही उनका सहारा था। सारा सामान माँ के पास था। मगर उन आँखों में नींदों की कल्पना भी कैसे की जा सकती है, जो पिछले बीस-बाईस घंटों से आदमियों के जंगल में पचास-बावन सालों के दांपत्य प्रेम को खोने का ग़म झेल रही हो। फिर वहाँ का पुलिसिया अंदाज़। किसी भी यात्री को सोते समय इस बात की भी सावधानी रखनी पड़ती थी कि पुलिस वाले कभी भी आकर यहाँ से खदेड़ देंगे। वे लगातार पश्चाताप कर रहे थे-'मुझे पता होता तो मैं कल सुबह उसे साथ लेकर ही टिकट खिड़की पर जाता। मुझे क्या पता था कि टिकट लेने में तीन घंटे लग जाएँगे। लगभग ग्यारह बजे टिकट लेकर वापस आया, तो तेरी माँ गायब थी। पुलिस वाले लगातार लोगों को इधर-उधर कर रहे थे। ऊपर तेज़ धूप पड़ रही थी। नीचे स्टेशन की सीमेंट की फर्स तप रही थी। दसियों ह्ज़ार यात्रियों की भीड़ में उसे कैसे ढूँढूँ, समझ नहीं आ रहा। पूरा स्टेशन छान मारा, मगर........।'

स्टेशन पर भोर का ही मंजर देख उनकी बातों को कल्पना के सहारे समझा जा सकता था। रात तक लगभग सत्तर फीसदी यात्री अपने घरों को वापस जा चुके थे। मगर इसके बावजूद स्टेशन पर चलते वक़्त शरीर आपस में भिड़ रहे थे। यात्री टिकट खिड़की पर घर वापसी का टिकट लेने के लिए लाईनों में खड़े थे और कई घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। स्टेशन अहाते के एक कोने में एक केबिन के बाहर लंबी लाइनों में बुजुर्ग महिला-पुरुष और जवान बेबसी के साथ अपने प्रियजनों को यह सोचकर कि उनकी आवाज़ सुनकर वे दौड़े चले आएँगे, आवाज़ लगाने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।

प्लेटफार्म पर चलते-चलते पिछले दस-ग्यारह घंटे का भयावह घटनाक्रम खुली आँखों में चल ही रहा था कि अचानक मेरे बाएँ कंधे को प्रेरणा ने थपथपाया -'आप महिलाओं के उस झुंड में देखो तो ज़रा। वहाँ कई औरतें आपस बतियाँ रही हैं।'मैं घबराया- कहाँ? अचानक प्लेटफार्म के आखिरी सिरे पर लगभग ही एक ही रंग की धोती पहने महिलाओं का एक झुंड मुझे दिखाई दिया और उस झुंड में एक जानी-पहचाने सी आकृति का आभास हुआ। रोम-रोम में झुनझुनाहट पैदा हो गई। प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों और उनके सामानों को लाँघता हुआ, उस झुंड के करीब पहुँचा। हाथों को जोड़कर घुटनों के ऊपर रखने वाली उस आकृति से मुझे जुड़ाव सा महसूस हुआ। मैं उसे पीठ की ओर से देख पा रहा था, इसलिए निश्चितता में अभी कुछ पलों का वक़्त था। जैसे ही झुंड के बगल से निकल उस आकृति के एकदम ठीक सामने आया, मन और जुबां एक पल के लिए ख़ामोश हो गए। माँ निÏश्चत थी, मगर पिता की चिंता उन्हें खाए जा रही थी। मुझे और प्रेरणा को अचानक वहाँ पाकर अचरज के साथ उनकी आँखों में चमक सी आ गई थी। बीस-बाईस घंटों के कुंभ के वनवास के बाद पिता ने माँ को देखा और माँ ने पिता को पाया, तो आसपास खड़े लोगों की आँखें भी भर आई। पिता भर्राए गले से कुछ न बोल सके। माँ और पिता से लिपट मैं गंगा माँ को धन्यवाद दे रहा था। गंगे, तुमने मेरी तपस्या पूरी कर दी।


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