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ISSN 2292-9754

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01.18.2015


कमाऊ पूत

उसे संसार में आए अभी महज़ ढाई तीन महीने ही हुए हैं। लड़का है। तो यह भी तय है कि वह कमाकर अपने माँ-बाप का पेट पालेगा। लेकिन इतनी जल्दी उसे यह सौभाग्य मिल जाएगा, उसने भी नहीं सोचा होगा। ईश्वर ने उसे पैरों से लाचार पैदा किया है। पैरों के नाम पर सिर्फ तीन-चार इंच लंबे और खाल से ढके माँस के लोथड़े, जिनमें छोटी-छोटी उँगलियाँ उभर आई प्रतीत होती हैं। जब पैदा हुआ होगा तो गरीब माँ ने ईश्वर को लानत भेजी होगी। लेकिन अब उसका कन्हाई कमाने लगा है। माँ के मन में ठंडक है कि परिवार का पेट पल रहा है। वह हाथ फैलाए यात्रियों से अपने कन्हाई के नाम पर पैसा माँग रही है। श्रद्धालु इसे भगवान का चमत्कार समझ उसकी ओर सिक्का उछालते हरि का नाम लेते आगे बढ़ रहे हैं। चाँदनी रात में गोवर्धन पर्वत के अहाते में ठंडी रेत पर बिछी मैली चादर पर आँखें मूँदे लेटे कन्हाई के पास जैसे ही एक श्रद्धालु ने पाँच रुपए का भारी सिक्का फेंका, वह दर्द से कराह उठा। माँ अंदर से घबराई, पर चेहरे पर कोई तनाव नहीं आने दिया। थोड़ी देर में वह चुप हुआ।

आज पूर्णिमा है। गुरु पूर्णिमा। पुण्य कमाने की अद्भुत रात्री। गोवर्धन पर्वत की लगभग सात कोस यानी इक्कीस किलोमीटर लंबी पद यात्रा में दूर-दराज से पुण्य कमाने आए सेवाभावी लोगों ने श्रद्धालुओं के लिए ठंडे जल के लिए शामियाने लगाए। कइयों ने शरबत पिलाने की व्यवस्था की। हर चार-पाँच सौ मीटर की दूरी पर हलवा, पुरी, पकौड़ी, चनों की खुशबुएँ उड़ रही हैं। पुण्य आत्माओं ने परलोक में जन्म सुधारने के लिए यात्रियों की मुफ्त भोजन व्यवस्थाएँ कर रखी हैं। थके-माँदे श्रद्धालुओं के लिए सेवाभावी लोगों ने गरमा-गरम चाय के प्रबंध किए हैं। हर दो सौ मीटर पर देवी-देवताओं के मंदिरों में यात्री धोक देते चल रहे हैं। बड़े-बड़े दानपात्र मंदिरों के आगे रखे हुए हैं, जिनमें पचास रुपए में आई चालीस सिक्कों की थैली में से यात्री एक-एक सिक्का डालते जा रहे हैं। पदयात्रा के दोनों ओर बंगाल, उड़ीसा, बिहार और देश के अलग-अलग हिस्सों से आई विधवाओं के पुराने कटोरों, गिलासों और झोलियों में प्रसाद के मुरमुरों के साथ एक-एक के सिक्के उछालते श्रद्धालु खुद को धन्य मानते हुए बढ़ रहे हैं। गोवर्धन पर्वत की तलहटी विचरण कर रही गायें और कदम्ब के पेड़ों पर उछल कूद रहे लंगूर केले खाकर तृप्त हैं। फिर भी श्रद्धालु पुण्य का कोटा पूरा करने के लिए बंदरों के आगे केले फेंकते आगे बढ़ रहे हैं। लगातार... बहुत जल्दी में।

लेकिन उस कमाऊ पूत को कोई जल्दबाजी नहीं है। वह निराशा में डूबा है। उसकी इच्छा तो इस रात्री की यहीं रोके रखने की है। जिससे उसके नीचे बिछी चादर पर श्रद्धालु सिक्के फेंकते रहें। उसकी चिंता यह है कि कल से उसकी माँ कैसे घर चलाएगी। इसी चिंता में मगन है उस माई का कन्हाई।

कल के बाद अमावस तक कैसे चलेगा माँ का गुज़र-बसर। बस यही एक मात्र मेरी चिंता है, वह चिंतित है और ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। अब अगले लगभग बीस-पच्चीस दिनों तक माँ कैसे काम चलाएगी। हर महीने पूर्णिमा से आठ दिन पहले से अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं हमारे। लेकिन इस बार तो बड़ी पूर्णिमा होने के कारण लाखों की संख्या में तुम्हारे भगत लोग आए हैं। इतनी संख्या में हर महीने कहाँ आते हैं। मेरी माँ सोचती है, अगले साल तो मैं एक डेढ़ साल का हो जाऊँगा। बड़ा हो जाऊँगा, मुझे चिंता है, तब कहीं लोगों के दयाभाव में कमी न आ जाए। मैं तो अपने पैरों पर भी खड़ा नहीं हो पाऊँगा। कैसे पेट भरूँगा माँ।

उसे इस बात का अफ़सोस है कि वह दूसरे अन्य श्रद्धालुओं की तरह परिक्रमा नहीं कर सकता। माँ में इतनी ताकत नहीं है कि वह मुझे अपने शरीर से चिपका कर परिक्रमा करा सके। और हाँ, माँ थक जाए तो मैं तो थोड़ी देर के लिए ज़मीन पर बैठ भी तो नहीं सकता। लेकिन माधव, मैं तेरी प्रदक्षिणा करना चाहता हूँ। अपनी लाचारी के बावजूद। मुझे भी अपने हिस्से की किस्मत चाहिए। भले ही प्रकृति ने मुझे लाचार बना दिया है। लेकिन मैं इससे निराश नहीं हूँ।

हे कृष्णा, मैंने आस्ट्रेलिया के निकोलस जेम्स उर्फ निक वुजिसिस के बारे में लोगों को बात करते सुना है। अब तक लाखों लोग यू ट्यूब पर उसको सुन चुके हैं। लोग बताते हैं कि पैदाइश के वक्त वह तो मुझसे भी अभागा था। वह चारों हाथ-पैरों से हीन था। मेरे कम से कम दोनों हाथ तो हैं। फिर भी देखो ना, आज तीन करोड़ से ज़्यादा लोगों की ज़िंदगियों को अपनी प्रेरणादायी बातों से रोशन कर चुका है। पूरी दुनिया के लोग उन्हें सुनना चाहते हैं। जीवन के बत्तीस वर्ष पूरा कर चुका है वह। आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालय में उसे स्नातक तक पढ़ने का अवसर मिला। क्या मुझे इतनी आयु तक जीने का भी अवसर मिलेगा, वह ईश्वर से सवाल करता है। क्या लोग मुझे भी सुनेंगे। या फिर मैं यहीं मथुरा-वृंदावन-गोवर्धन की गलियों में अपनी माँ का भीख का हथियार बना रहूँगा और थोड़ी उम्र पाकर खुद को इतना असहाय महसूस करूँगा कि मेरे पास भीख माँगने के अलावा पेट भरने का कोई दूसरा उपाय ही नहीं होगा। तुम्हारी लोकतंत्र मूल्यों वाली सरकार या कोई उदारवादी सामाजिक संगठन मुझे हद से हद एक ट्राइ साइकिल देकर मुझ पर उपकार कर देगा। लेकिन मैं निकोलस जैसा बनना चाहता हूँ। मेरे पास दो हाथ हैं और भरपूर इच्छा शक्ति। हाथ से लिख सकता हूँ। पढ़ सकता हूँ। मुझे तुम्हारे पर्वतों की तलहटी में नहीं रहना। कहीं कोई प्राइमरी स्कूल तो होगा तुम्हारी नज़रों में। मैं आपको मेरे जीवन का सारथी बनाना चाहता हूँ। इस कुरुक्षेत्र में मैं अकेला हूँ। क्या मुझे भी दोगे कर्मयोग का ज्ञान? इन खुले सिक्कों की मार को मैं कब तक अपनी कोमल देह पर झेलता रहूँगा। बहुत पीड़ा होती है। तभी एक यात्री द्वारा फेंका सिक्का उछलकर उसके मुँह के पास जा गिरा। उसकी नींद टूटी। स्वप्न बिखरा। वह बिलखने लगा। माँ ने एक हाथ से उसके सिर को सहलाया और दूसरे से पैसों को समेटकर कपड़े के एक मैले-कुचैले थैले में डालने लगी। वह सुबकता रहा। सुबह होने वाली थी। दानघाटी पर मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी लाईन लगने वाली थी।


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