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03.13.2014


बाग़ी हो गए

हुक्मे तानाशाह से बेज़ार बाग़ी हो गए
बाज़ अब तो आइए इस तुगलकी फ़रमान से

कैद से अण्डे की हम आज़ाद होकर क्या करें
पंख कतरोगे हमारे परवरिश के नाम से

ऊँची दीवारें उठाकर रोक दोगे धूप को
बात अफ़लातून सी और फ़ैसले नादान से

लिख गई तारीख़ किस्से ताज के मुमताज़ के
पीर कुछ तो पूछिये बुनियाद के पाषाण से

जंग अपने खंजरों की पत्थरों पर ही छुड़ा
ज़ौक में मत काटना हर्गिज़ गले इंसान के

क़त्ल कर मासूम का हर बार रोए हैं बहुत
इल्तिजाए अम्न अब हथियार करते म्यान से।।


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