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03.13.2014


आह्वान

सुना रही चुनौतियाँ, शर्मसार देश को
झटक दिया है द्रौपदी ने फिर से मुक्त केश को

अब रमा सरस्वती के, रूप को तिलांजलि
त्याग को ममत्व को, आखिरी जलांजलि

दुशासनों के रक्त से, कब धुलेंगी वेणियाँ
तार तार अस्मतें, बिलख रही है बेटियाँ

जांघ दुर्योधन की आज, कोई बढ़के तोड़ दो
समाज के पितामहों, अब तो मौन तोड़ दो

ओ चक्रपाणि हो कहाँ, पुकारती है मानवी
आसमान फट पड़ा, दरक के धंस गई ज़मीं

कोख में उबाल ले रहा है, रक्त सृष्टि का
क्यों वासना के पंक में, यूँ आदमी फिसल रहा

ये श्रावणी फुहार अब, धधक उठी है ज्वाल सी
तू वतन की आबरू है, शक्तिपुंज दामिनी

प्रचण्ड श्रृंखला पुरुष भी, बढ़के अपना हाथ दो
कसम है माँ के दूध की, राखियों का साथ दो।।


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