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04.29.2012

पहाड़ और पीठ
 

एक

पहाड़
सिर्फ पीठ होता है
मुँह होता तो बोलता
पहाड़ के पैर भी
नहीं होते
हाथ भी
वरना वह चलता
कुछ करता
या, उठता बैठता भी
पहाड़, अपनी पीठ पर
लाद लेता है
तमाम जंगल
नदी नाले,
हरी भरी झील भी
सड़क और बस्तियाँ भी
और कुछ नहीं बोलता
क्योंकि पहाड़
सिर्फ पीठ है
और पीठ
कुछ नहीं बोलती

दो

पीठ, पहाड़ नहीं होती
पर लाद लेती है
पहाड़
पीठ के भी मुँह
नहीं होता
पहाड़ की तरह
होती है एक
सतह
जो थपथपायी जाती है
पहाड़ लाद लेने
के एवज में, यही
पीठ गोरी व चिकनी है
तो फिसलती हैं
नज़रें व हाथ भी
और, लद आते हैं
पहाड़
और उग आते हैं
आँखों के जंगल
खुंखार व भयावह
यही पीठ
सख़्त और मज़बूत है तो
नहीं दिखा सकती पीठ
तमाम नश्तर व खंजर
लगने के बाद भी
क्योंकि पीठ पर
पहाड़ होते हैं, और
पहाड़ के मुँह नहीं होता
और पीठ के भी


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