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05.03.2012
 
संयम
मुकेश पोपली

क्या वजूद है
तुम्हारा
आधुनिक युग में
जहाँ दौड़ रहा है
दुनिया को अपने
हाथों में कैद
करने के लिए
न जाने क्यों
न जाने किसके लिए
न जाने किस
रूप में
और किस
स्तर पर
व्यक्ति

हथकंडे
सब तरह के
काम में ले कर
पा लेना चाहता है
सब के हिस्से का
सब कुछ
सब से पहले
सब से ज्यादा
व्यक्ति

ज़मीन तलाशती
बंजर आँखें
शर्म ढूँढती
झुकती आँखें
स्नेह को तरसती
मासूम आँखें
नहीं देख पा रहा
आँखों में सब कुछ
बसा लेने को आतुर
व्यक्ति

कानों में
सिर्फ उसके
गूँज रहा है
मेरा-मेरा का मीठा
स्वर
जो समेटे है
अपने अन्दर
ख़ौफ़नाक आवाज़ें
डरी हुई चीखें
सहमी हुई सिसकियाँ
उजड़ी आहें
ठहरी हुई सदायें
नहीं सुन पा रहा
व्यक्ति

कहाँ जा कर
होगा अंत
इस अथाह
सागर की
गहराई या
दूसरी तरफ का
दूर होता
किनारा
नहीं जानता
व्यक्ति ।


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