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09.06.2008
 

मेरे शब्द
मुकेश कुमार तिवारी


मेरे शब्द,
जब से पैदा हुए
तभी से खोज रहे हैं
अपने होने के मायने

मेरे शब्द,
लगातार पैदा होते हैं
जैसे चींटी देती है अंडे,
ढेर से बरसात में
या जैसे ओस की बूँदे
फैल जाती हैं दूब की चादर पर
या खेत उगल देता है
अनाज खलिहान में

मेरे शब्द,
ना ज़हर बुझे होते हैं
ना ही ढले होते हैं शीशे की तरह
सीधे, सरल शब्द
जब भी निकलते हैं बाहर
भटक जाते हैं

मेरे शब्द,
ना तो मर्म पर चोट करते हैं
ना ही भेदते हैं कोई दिल
ना नश्तर से होते हैं, ना तीर से
हर बार ही कमोबेश
चूक जाते हैं लक्ष्य

मेरे शब्द,
इतने कमज़ोर होते हैं
कि खुद बयाँ नही करते किस्सा सीधे
करते हैं बातें प्रतीकों के माध्यम से
और खुद को बचा भी लेते हैं
बदनामी से साफगोई के बाद

मेरे शब्द,
कई बार ठिठकने बाद
कभी पहुँचे गंतव्य तक तो भी
जुटा नहीं पाये साहस दस्तक़ देने का
ना कुंडी बजाने की कोशिश की
ना थपथपाने की द्वार
फिर लौट आये

मेरे शब्द,
कई बार मौकों पर
नही लाँघ पाये हलक की दहलीज़ को
बस घुट कर रह गये
या कभी कसमसा कर


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