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05.31.2008
 

जिज्ञासा
मुकेश कुमार तिवारी


जिज्ञासा,
चिपकी रहती है मेरे साथ
जैसे चिपकती है जोंक

जिज्ञासा,
मेरे साथ करती है कदमताल
जैसे परछाई पूरी जिन्दगी
चलती है साथ

जिज्ञासा,
मेरे अक्स के पहले ही
झाँकने लगती है आईने में
जैसे किसी ट्रेन के आने के पहले
पटरियों में दौडता है कंपन

जिज्ञासा,
मेरी रगो में दौड़ती है लहू के साथ
नख से शिख तक
धड़कती है मेरे दिल के साथ

जिज्ञासा,
पलती है मेरे मौन में
सुलगती है मेरे अंतर
जैसे ठंडी होने के बाद भी
राख पालती है आग सुलगते हुये

जिज्ञासा,
जलती है दीपक की तरह
मेरे साथ अंधकार से लड़ते
प्रकाशित करती अपने आसपास
और तले के अंधकार को
अपने हिस्से की रोशनी समझ
जारी रखती है अपना अभियान


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