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05.31.2008
 
हँसकर दिल पे ज़ख़्म खाये बेवजह
मुकेश कुमार मासूम


हँसकर दिल पे ज़ख़्म खाये बेवजह।
हमने दुश्मन दोस्त बनाये बेवजह।

सोचता हूँ अब कि उनकी याद में,
रात दिन क्यूँ अश्क़ बहाये बेवजह।

तोड़कर दिल को गया जो संगदिल,
अब क्यूँ उसकी याद सताये बेवजह।

यूँ मिटाना या अगर गुलशन तुझे,
फिर क्यूँ तूने गुल खिलाये बेवजह।

कहदो ऐ ’मासूम’ इस संसार से,
अब ना कोई दिल लगाये बेवजह।

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