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| 09.09.2007 |
| तम के बढ़ते साये मुकुन्द ध्यानी |
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दुपहरी तो कब की बीत चुकी
अब तो शाम ढलने वाली है तम के बढ़ते सायों से भय कैसा? अभी तो शेष अमावस की रात काली है। शून्य में ताकती हैं विवश निगाहें आलिंगन को तरसती हैं दुर्बल बाहें स्मृतियों में भटकती है पीछे छूट गई राहें अतृप्त ही रह गई मचलती चाहें शरीर तो थक चुका पर बलवती हैं आशायें हँसने को क्षण तो बीत चुके, शेष रह गई अब आहें उमर के इस पड़ाव में लगता है संसार खुशियों और उमंगों से खाली है तम के बढ़ते सायों से भय कैसा? अभी तो शेष अमावस की रात काली है। जरा की जकड़ में कसमसाता है यह तन जोड़ों के दर्द की ऐंठता से जर्जर बदन निद्रा विहीन रातों का ये सूना पन यादों के गलियारों में भटकता ये मन न तन में क्षमता रही न मन में लगन उम्र के आगे सब विवश हैं करो चाहे कोई जतन शरीर तो बुढ़ायेगा ही ये नियति टलती है, ना किसी ने टाली है तम के बढ़ते सायों से भय कैसा? अभी तो शेष अमावस की रात काली है। तुमको तो नाते रिश्तों की याद सतायेगी पर ये सच है कि तुम्हारी बात किसीको न भायेगी? अनुभव की सीख थोपोगे तो, अहम की दीवार से टकरायेगी स्नेह श्रद्धा तो दूर, अपनों की उपेक्षा रुलायेगी समय के रथ पर सवार, हर ज़िन्दगी इसी मोड़ से गुजर जायेगी पर यौवन की आँधी कभी, इस विवशता न समझ पायेगी यह पड़ावा तो है इक ऐसा चमन जिसमें न अब पुष्प है न कोई माली है तम के बढ़ते सायों से भय कैसा? अभी तो शेष अमावस की रात काली है। नाती पोतों की उँगली पकडकर कुछ दूर तो चलना ही होगा पुत्र पुत्रवधुओं के तानो का दंश भी तो सहना ही होगा अक्षम शरीर से क्यों है शिकायत, इसकी क्षमता का सुख तो तुमने ही भोगा मन को मनाओ भावुक न बनो, परिस्थितियों से समझौता तो करना ही होगा मनकी दृढ़ता से रिश्तों को बांधें, रिश्तों का निर्वाह तो करना ही होगा संशय मुक्त होकर हँसो और हँसाओ, जो होना है वो तो होता ही रहेगा निभाते रहे निभाते रहो वैसे ही जैसे अब तक निभाली है तम के बढ़ते सायों से भय कैसा? अभी तो शेष अमावस की रात काली है। |
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