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09.09.2007
 
धरती माँ
मुकुन्द ध्यानी


माँ धरती के प्रांगण में, सृजन के बीज बिखरते हैं।
माटी में अंकुर फूटें जब कण कण खुशियों से थिरकते हैं।
पुलकित धरती के अंग अंग में, रंग और रूप निखरते हैं,
मातृत्व बोध से सिहर धरा में, आशा के पुष्प मुखरते हैं।।

कीरी कुंजर प्राणी मात्र का, धरती पालन करती है।
समेट सभी को आँचल में, उनकी रक्षा करती है।
स्नेह प्यार दुलार सभी के प्राणों में स्पन्दन भरती है।
पशु हो पक्षी या मानव दानव, सबका सब दुख हरती है।।

हरित धरा के दामन में पशु निर्भय विचरण करते हैं।
जीवन का मधुर संगीत सुना, पक्षी भी कलरव करते हैं।
पल्लव किसलय पादप भी पुष्पों से पूजा करते हैं,
जीव प्रकृति जड़ चेतन सब, श्रृंगार धरा का करते हैं।।

पर धरा के प्रबुद्ध पुत्रों ने, जननी का हृदय तोड़ दिया,
मानव से दानव बन बैठे, शुभ कर्मों से मुख मोड़ लिया।
दमन और अत्याचारों ने, जग सारा ही झिंझोड़ दिया,
निरीह जनों की हत्यायें कर, यमराज से नाता जोड़ लिया।।

ताकत के ठेकेदारों ने, धरती का सब धन लूट लिया,
बेबस बेचारे देशों के फिर, झुकने पर मजबूर किया।
रचे बसे सुन्दर नगरों के, बमों से चकनाचूर किया,
दोष समर्थों का ही था, दण्ड असमर्थों को ही दिया।।

खूँखार आतंकी भेड़ियों ने, फिर मौत के नंगे नाच किये,
जब जिसको जैसे दिल चाहा, गाजर मूली से काट दिये।
वायुयानों में विस्फोट किये, खून से समुद्र लाल हुए,
मीनारों में यान घुसे, सहस्त्रों जल कर राख हुए।।

धम… का कहर रूप भयानक, अपहरण कर सिर काट लिये,
बम के धमाकों ने लाशों से, गली मुहाने पाट दिये।
धरती के पावन दामन में, मानव ने इतने छेद किए,
चाक चाक धरती का सीना, अंग अंग सब भेद दिये।।

दर्द से धरती सिसक पड़ी, और क्रोध से फिर हुंकार उठी,
नारी है, रण चण्डी बन, नागिन सी फुँकार उठी।
नेत्रों से ज्वाला बरस पड़ी, लाल हुआ मुख तनी भृकुटी,
जीव प्रकृति सहमे भय से, जब धरती की ललकार उठी।।

प्रकम्पित धरती का गात हुआ, पवन दिशायें मोड़ गया,
अम्बर लहरा कर ठहर गया, सागर सीमायें तोड़ गया।
उठा ज्वार ’कुनामी’ लहरों का, सब कुछ तोड़ मरोड़ गया,
इतिहास प्रलय की गाथा में अध्याय नया एक जोड़ गया।।

उद्वेलित सागर का अन्तर, गरम दग्ध सा खौल गया,
उफन उफन कर गरज उठा, धरती अम्बर तक डोल गया।
योजन भर ऊँची फेनिल लहरें, दिग दिगान्तर फैल गईं,
देश देश में मीलों तक, जो कुछ था सब लील गईं।।

डाल पात सब उखड़ गय, भवन रेत से बिखर गये,
घायल करते थे करुण क्रन्दन, जहाँ तहाँ वे छितर गये।
जीवित करते थे सतत रुदन, कहर देख वे सिहर गये,
शवों का अम्बार लगा था, कफ़न दफ़न को तरस गये।।

देख जननी तू देख वहाँ, सड़े गले शवों की दुर्गन्ध है,
सुन सुन चीत्कार अपने शिशुओं की, क्यों तेरी आँखें बन्द हैं?
तू जननी है तू सोच जरा, बहुत क्रूर बनी क्यों इतनी क्रुद्ध है,
इस भयावह क्रोध से उबर जा अब, तुझे मातृत्व की सौगंध है।।

द्यौ: शान्ति, पृथ्वी शान्ति, अन्तरिक्ष: शान्ति, शान्ति रोषधय।
शान्ति राप:, शान्ति सामा, शान्ति ब्रह्म:, शान्ति वनस्पतय:।।

क्षमा कर हे माँ धरती!, ये निर्बल शिशु तेरे पुकार रहे।
युग युग से पालन करती हो, हम पर तेरे उपकार रहे।
जय धृति धरा धरणी माता, धरती पर जीवन बना रहे,
जगे संगीत समवेत स्वरों में फिर शान्ति सुधा की धार बहे।।


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