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09.09.2007
 
बुढ़ापा
मुकुन्द ध्यानी


हँसता बचपन खिलता यौवन, खुशियों चमन सब छुट गया
मदमस्त जवानी के पौरुष को कमजोर बुढ़ापा लूट गया
क्या याद करूँ उन घड़ियों को
जब सारा जग ही अपना था
ऊँचा उठकर आसमान को
छू लेने का सपना था
उत्साह उमंग तरंगों का
मन में लहराता झरना था
हर ख़्वालहिश हर जज़्बे को
अपनी मुट्ठी में करना था
पर काल चक्र के फेरों में घिसते घिसते कुछ टूट गया
मदमस्त जवानी के पौरुष को कमजोर बुढ़ापा लूट गया
ब्यार बसन्ती की खुशबू
महकी महकी सी अमराई
दूर क्षितिज पर प्रथम किरण सी
अलसाई उषा ने ली अंगड़ाई
कल कल बहती नदिया के स्वर में
बजती रहती थी शहनाई
प्रकृति नटी भी छलना बन गई जब से मुझसे बचपन रूठ गया
मदमस्त जवानी के पौरुष को कमजोर बुढ़ापा लूट गया
कब छूटा भोला बचपन, कब
यौवन की प्रचण्ड ब्यार बही
क्या करना या क्या कर बैठा
यह सुध-बुध भी तो बिसर गई
जीवन में मस्त बहारों की
अनवरत होती बरसात रही
भले बुरे और पाप पुण्य का
लेखा जोखा याद नहीं
भीली बिसरी यादों का घट आज अचानक फूट गया
मदमस्त जवानी के पौरुष को कमजोर बुढ़ापा लूट गया
पीली पीली धूप गुनगुनी
लम्बी होती आँगन में छाया
उम्मीद, उमंगें सहमी सी
ढीली ढीली लगती काया
कहाँ गया वह तेज वेग
सहमी सहमी मरती माया
छलना है यह जगत का जीवन
कुछ याद नहीं क्या खोया पाया
क्षणभंगुर है यहाँ यौवन और जीवन आज भ्रम यह टूट गया
मदमस्त जवानी के पौरुष को कमजोर बुढ़ापा लूट गया


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