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07.24.2014


यतीम

ज़र नहीं, नज़र भर के दे
नन्ही दुआ को असर कर के दे
चराग जला रिश्तों के नए
यतीमखानों को घर कर के दे

बेयक़ीनी दुनिया में कुछ भी मुस्तकिल नहीं
आज मैं तन्हा हूँ कल तुझे महफ़िल नहीं

ले के यतीमी में नाम यतीम
मरते हैं रोज़ तमाम यतीम
यतीमों की ही बिछती है सफ यहाँ
यतीमों की मस्जिद ईमाम यतीम

हाल-ए-दिल किसी को खुल कर बता सके ना
लिखा है जो जबीं पर सजदा मिटा सके ना

गुल मुरझाया हुआ हूँ खार नहीं
तकदीर की मार हूँ गुनहगार नहीं
आदम हूँ एक मैं भी जन्मा हूँ कोख से
कया मैं मोहब्बत का भी हकदार नहीं

सीने में दिल यहाँ भी यहाँ भी ख़्वाहिशें हैं
क़िस्मत में है वो मौसम ग़म की ही बारिशे हैं!!


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