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03.15.2014


परिंदा

शब के आखरी लमहे का नसीमे सबा को पैग़ाम आया
चहचहा के परिंदा पर फैलाए लबे बाम आया

नीमबाज़ आँखें ख़्वाब से जब हुईं बेदार
शुरूआत दिन की हुई सुन परिंदों की ग़ुफतार

एक परिंदा नज़र नहीं आता शायद शहर छोड़ गया हो
या आस-पास ही किसी पिंजरे में दम तोड़ गया हो

कफस में परिंदों को ख़ौफ-ए-सैयाद नहीं होता
आखरी परवाज़ कब भरी थी याद नहीं होता

पनाह में आए परिंदों का शिकार क़त्ल-ए-आम है
ऐसे शिकार का तो क़तरा-ए-ख़ूँ भी हराम है

परिंदों के परों पर हवाओं में शबाब देखो
आज़ाद आसमानों में देखो, पिंजरों में न खाना- खराब देखो

बात ये नहीं के मुहब्बत-ए-बशर का वो तलबगार नहीं
दर-हक़ीकत फितरत-ए-इंसान पे उसे ऐतबार नहीं !!!


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