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03.15.2014


मुंबई हमला - 2008

हैवानियत की महफिल में, खून से भरा जाम देखा, बहुत कुछ सरे-आम देखा
उन दिनों मुम्बई में क़त्ल-ए-आम देखा.........
शहर खौफ-ओ-खतर में और आफत का हंगाम देखा
क़यामत आकर चली गई दहशत को सुब्हो- शाम देखा
मासूम कितने यतीम हुए ये किस आलम का कोहराम देखा
दुश्मन के नापाक इरादों पर न अपना मगर इन्तक़ाम देखा
बहुत कुछ सरे-आम देखा, उन दिनों मुम्बई में क़त्ल-ए-आम देखा.........

आवाम की तमाम उमीदों पर कुर्सी को करते आराम देखा
शहीदों की जाँ की बाज़ी पर बस देते हुए ईनाम देखा
मौक़े की ही तलाश रखना विपक्ष का एक यही काम देखा
भाषण से लेके शासन तक नेता का दावा नाकाम देखा
बहुत कुछ सरे-आम देखा, उन दिनों मुम्बई में क़त्ल-ए-आम देखा.........

मज़हब आतंकवाद के नाम पर क़ोम को होते बदनाम देखा
इन्सानियत का खून और ज़मीर को होते नीलाम देखा
बेगुनाहों के लहू में तर ज़मीं को सॅंवरते आम देखा
आगे ही आग़ाज़ किया नहीं उसी का ये अंजाम देखा
बहुत कुछ सरे-आम देखा, उन दिनों मुम्बई में क़त्ल-ए-आम देखा
हैवानियत की महफिल में, खून से भरा जाम देखा, बहुत कुछ सरे-आम देखा
उन दिनों मुम्बई में क़त्ल-ए-आम देखा!!!


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