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03.15.2014


हिन्द नाम काफ़ी है

गंगा जहाँ बहती है हिमालय का सीना चीर
जन्नत जिसे कहते हैं ज़मीं की वो है कश्मीर
नक़्शा-ए-जहाँ पे जो दिखती है मुक़म्मल
हर सिम्त से दिलकश बड़ी लगती है ये तसवीर

मौसम भी मुआफ़िक यहाँ हर जान के लिए
इक हिन्द नाम काफ़ी है पहचान के लिए

बर्फीले हैं पर्वत तो कहीं धूप में सहरा
जितने यहाँ मज़हब हैं प्यार उतना ही गहरा
तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का ज़माना करे चर्चा
मुख़्तलिफ़ ज़ुबां और मलाबिस में है चहरा

मिसाल मुहब्बत की यहाँ ताज अजूबा
कहलाती है जिससे ज़मीं आलम की महबूबा

गाँधी बहादुर भगत सुभाष और आज़ाद
क़ुरबान सभी हो गए कह-कह के ज़िंदाबाद
आँखों से खूँ टपकता था गाता था दिल मगर
गीत इंकलाब के कर-कर के हमको याद

लगा के जां की बाज़ी वो लहरा गए परचम
देखे अब आँख उठा के भी दुश्मन में नहीं दम !!!


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