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ISSN 2292-9754

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04.10.2018


याज्ञसेनी

क्या हुआ दुशासन? शांत हो क्यों?
क्यों रुके? कहो, तुम क्लांत हो क्यों?
विस्तार देखकर मेरे वस्त्र का
इतने भयाक्रांत हो क्यों?
शत हाथियों का बल जो भुजाओं में है -
तुम वह सब लाओ,
चाहो तो अपने साथ सभी
भाइयों को भी तुम बुलवाओ!
सब कर लें जितना हो प्रयास,
अब नहीं किसी से तनिक डरूँगी,
याज्ञसेनी है नाम मेरा!

पर एक क्षण रुको, मैं अभिवादन कर लूँ -
उनका, जो महाभट ज्ञानी हैं,
कुलरक्षक ये पितामह भीष्म,
जो अपने धर्म पे नित अभिमानी हैं।
इनकी, गुरु द्रोण, कृपाचार्य की दृष्टि से,
कहो ये अधर्म पार गया कैसे?
जो पुरुष स्वयं को हारा था पहले,
वह मुझको फिर हार गया कैसे?
कुलवधू के वस्त्रहरण से जो नयन जलेंगे नहीं,
समग्र कुल का विनाश देखेंगे नयन वही,
अब इस योद्धाओं से भरी सभा में,
बिना शस्त्र मैं युद्ध लड़ूँगी,
याज्ञसेनी है नाम मेरा !

दलदल में खिला कमल हूँ मैं,
जिसपर कीचड़ के छींटे हैं,
चंदन-सी पवित्र आत्मा मेरी,
जिसपर सब विषधर लिपटे हैं।
मुझसे पवित्र है कौन यहाँ?
व्यभिचारिणी नहीं- ये अंगराज समझ न पाया है,
जो अग्नि शुद्धता की परीक्षा लेती है,
मेरा संपूर्ण अस्तित्व उसी से आया है!
गंगाजल की भाँति करती सबको सदा पवित्र हूँ मैं,
यदि गंगाजल अपवित्र है, तो हाँ,अपवित्र हूँ मैं!
मगर अबला समझे मुझको न कोई अब,
अग्नि-सुता हूँ, श्वास हरूँगी,
याज्ञसेनी है नाम मेरा!

किस काम का धर्मराज का धर्म?
पत्नी की रक्षा कर पाया क्या?
गांडीव धनंजय का, वृकोधर की शिला-सी भुजाएँ,
भला काम मेरे कुछ आया क्या?
आश्चर्य! ये 'धर्मज्ञाता' अब भी,
मान बैठे हैं कि कोई भ्रमित नहीं,
अरे! जो धर्म अधर्म सिखाने लगे,
उस धर्म की व्याख्या उचित नहीं!
जल-सम शीतल मन को आज से आग किया,
आज,अभी से 'महाबली' पतियों का मैंने त्याग किया!
मैं स्वयं सबल, सबके दंडों के रिक्त कुंभ में,
आज मृत्यु का विष मैं भरूँगी,
याज्ञसेनी है नाम मेरा!

जो ज्वाला चूल्हे को जलाती है,
वही ज्वालामुखी रूप भी धरती है,
वही नारी अब स्वच्छ करेगी जगत,
आंगन को स्वच्छ जो करती है।
युगों तक अनगिनत ये कष्ट सहेंगे,
मृत्यु निरंतर अपनी खोजेंगे,
जीवित रहेंगे, पर सौ मृत्युओं-सी
ताड़ना इसी जन्म में भोगेंगे।
सभा में हर व्यक्ति ने आज स्वयं मुख से मृत्यु माँगी है,
नारी का मूक अपमान देखकर पाप की सीमा लाँघी है।
कपट-सभा में बैठा यह कुल सारा,
मैं श्राप से अपने भस्म करूँगी,
याज्ञसेनी है नाम मेरा !

विनती न करो काका-काकी,
क्षमा का दान नहीं मैं करती हूँ,
सर्वस्व दिया है जिस कुल,
लो कोप का भी बलिदान आज करती हूँ!
चाहिए न कोई वर मुझको,
बस पांडु-पुत्रों को मुक्त करो,
दंड सबको देने में स्वयं ये सक्षम हैं,
इन्हें पुनः अस्त्रों-शस्त्रों से युक्त करो!
यह शृंगाल की ध्वनि सुनते हो?
बीज कुल-नाश के बोए जाएँगे,
ये केश मेरे अब तभी बँधेंगे,
जब दुशासन के रक्त से धोए जाएँगे !
उस प्रलय तक पति-हीन रहूँगी मैं,
यह चूड़ामणि नहीं मैं धरूँगी,
स्मरण रहे -
याज्ञसेनी है नाम मेरा!


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