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ISSN 2292-9754

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03.08.2015


हिन्दी का वाणिज्यिकरण

सर्वप्रथम मैं “विश्व हिन्दी दिवस” के अवसर पर उन मनीषियों, देशभक्तों और शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित करता हूँ जिनके दृढ़ संकल्प, कठिन परिश्रम, त्याग और बलिदान से भारत को आज़ादी मिली। इसके साथ ही मैं उन देशभक्त जवानों के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ जिन्होंने इस देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं अखंडता की रक्षा के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया। इस 68 वर्ष के लम्बे अन्तराल में सूचना, प्रौद्यौगिकी, कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, इंजिनियरिंग आदि के क्षेत्र में आशातीत सफलता हमने प्राप्त की और कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर हो गए हैं फिर भी हिन्दी जो कि हमारी राष्ट्रीय भाषा है उसे हम अपने देश में सम्मानजनक स्थान नहीं दिला सके हैं।

हमारी आज़ादी से पहले सात मार्च 1935 को लार्ड मैकाले के जिस फरमान पर लार्ड विलियम बैंटिंग ने हस्ताक्षर किए थे, उस पर हम भारतवासी ध्यान दें तो समझ में आएगा कि उस फरमान में भारतवासियों को सदा के लिए गुलाम बनाने की भावना थी। 1854 में चार्ल्सवुड ने जब भारत में अँग्रेज़ी शिक्षा संबंधी आदेश प्रसारित किया था, तो उसके अनेक पहलुओं में भारत में नौकरशाह तैयार करने के साथ-साथ भारतीय लोगों में से कुछ को ‘डी-क्लास’ या डी-नेशन’ कर अपने अनुकूल बनाना भी था। उनका अंतिम और महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत की जनता में अँग्रेज़ी सुख-सुविधा की ऐसी होड़ जगाना था, जिससे ब्रिटिश माल की खपत भारत में हो और उनके द्वारा तैयार की गई नई-नई चीज़ों का बाज़ार तैयार हो सके। उनका यह सब काम अँग्रेज़ी भाषा के माध्यम से उपभोगतावादी संस्कृति के निर्माण की सोची-समझी नींव थी। विदेशी चीज़ों के उपभोग की मानसिकता विदेशी भाषा के ज़रिए ही जगाई जा सकती है, चार्ल्सवुड का ऐसा विचार था। क्योंकि उपभोगमूलक संस्कृति में पनपी भाषा अपने साथ सिर्फ संस्कृति ही नहीं, अपना बाज़ार भी लाती है। चार्ल्सवुड यह भी अवश्य जानता होगा कि भारतीय भाषाएँ जिस संस्कृति में पली बढ़ी हैं, उसी भाषा में इस देश पर उपभोक्तावाद लादना अधिक कारगर हो सकेगा। परन्तु हमें यह ध्यान रखना होगा कि तब अँग्रेज़ों ने भाषा को बाज़ार की भाषा नहीं बनाया था, बाज़ार के विकास में उससे सहायता ली थी। महात्मा गांधी का आंदोलन अँग्रेज़ी शासन के साथ अँग्रेज़ी भाषा की इसी उपभोक्तावादी संस्कृति के विरुद्ध था। उन्होंने लोगों में स्वदेशी भावना जगाने के लिए विदेशी समान का बहिष्कार करने, विदेशी कपड़ों की होली जलाने आदि जैसा सक्रिय आन्दोलन तो चलाया, साथ ही उन्होंने स्वदेशी भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दी। दूसरी ओर उपभोक्तावाद और वैज्ञानिकता के नए युग में प्रवेश करने की दौड़ में विदेशी सहायता से बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए। विदेशी वस्तुएँ आयात की गईं और बहुत सी चीज़ें चोरी-छिपे भी भारत आने लगीं। जिससे देश के अभिजनों में दिन पर दिन विदेशी वस्तुओं की लालसा बढ़ती गई और धीरे-धीरे निचले स्तर तक फैल गई।

ऐसे समय में अमेरिका और यूरोप से जन्मे भूमंडलीकरण ने भारत में प्रवेश किया, जो कि विश्व के बाज़ारीकरण की नई अवधारणा और प्रक्रिया थी। उनके लिए 1.5 अरब जनसंख्या वाले भारत के बाज़ार पर कब्ज़ा करना, विश्व के छठवें भाग पर कब्ज़ा करना था। आज दुनिया के बाज़ारों में भारत तीसरे नंबर का सुरक्षित बाज़ार है। यहाँ कम जोखिम है, शान्ति है, अधिक कच्चा माल और सस्ते मज़दूर मिलते हैं तथा शोषण की भी आज़ादी है। ऐसा बाज़ार तो दुनिया का स्वर्ग ही है। इस बाज़ार में अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए सर्वसाधारण की एक भाषा की भी ज़रूरत थी, क्योंकि हमारे लोग तो उपभोक्ता मानस बन ही चुके थे, सिर्फ इसका विस्तार करना था। विदेशी बाज़ार ने समझ लिया था कि तमाम क्षेत्रीय भेद-भावों के बावजूद भी पूरे देश में प्रचलित भाषा हिन्दी ही है। इसलिए विश्व बाज़ार का मुख्य लक्ष्य रहा कि हिन्दी को बाज़ार की भाषा बनाया जाए, यानी इसे बाज़ारू रूप दिया जाए। मतलब, जो काम कभी अँग्रेज़ हिन्दी वर्णक्युलर से लेता था, वही काम अब अँग्रेज़ ‘बाज़ारू हिन्दी’ और देशी भाषाओं से ले रहा है और इसे पहले से भी नीचे स्तर पर रखकर। इसलिए विज्ञापनों में, दूरदर्शन धारावाहिकों में, अन्य प्रचार-विधियों में हिन्दी के बढ़ते प्रयोग से ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस प्रक्रिया में हिन्दी के साथ, जो खेल खेला जा रहा है, वह रोंगटे खड़े करने वाला है। आज हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति सृजन से परे रखकर बाज़ार की भाषा के रूप में ढालने के प्रयास हो रहा है। इसके भीतर मिलावट की जा रही है, जितनी तरह से इसे भ्रष्ट किया जा सकता है, किया जा रहा है और यह हिन्दी की जड़ें काट रहा है। इस बाज़ारू भाषा से हिन्दी का कोई भला नहीं हो रहा है, बल्कि बाज़ार को ही लाभ मिल रहा है, जो कि उनका लक्ष्य भी है। बाज़ार ने अपने उपयोग के लिए हिन्दी को सबसे पहले उसके लिखित रूप से अलग किया, इसे उन्होंने सिर्फ बोलचाल की भाषा में बदल दिया है। फिर उस बोलचाल की भाषा को अपनी उपभोक्ता संस्कृति से जोड़ने के लिए तोड़-मरोड़ कर अनेक तरह की मिलवाटों से बाज़ार की भाषा में बदल डाला। जितने भी उत्पाद हैं, दुकानें हैं, यहाँ तक कि पोशाकें हैं – उन पर भी अँग्रेज़ी लिखी होती है। सम्पूर्ण व्यापार-व्यवसाय और व्यवहार की लिखित भाषा अँग्रेज़ी बन गई है। यह उस 95 प्रतिशत जनता से लाभान्वित हो रही है, जो उससे परिचित ही नहीं है, बस उसे परिचित कराने के लिए ही हिन्दी और भारतीय भाषाओं को नए रंग-ढंग में ढालकर बोला जा रहा है। टेलीविज़न पर दिन में सैकड़ों बार हिन्दी में उन्हीं चीज़ों के नाम लिए जाते हैं, जिन पर हिन्दी लिखित लेबल चिपका दिया जा चुका है। यानी लिखित अँग्रेज़ी को अनिवार्य बनाया जा रहा है, मौखिक हिन्दी के माध्यम से। हिन्दी के माध्यम से समझाया जा रहा है कि अँग्रेज़ी कितनी ज़रूरी है, कितनी अपरिहार्य है। हिन्दी के माध्यम से बेचे जा रहे उत्पाद, जो भारतीय स्रोतों से बने हैं, परन्तु जिनको विदेशी लिबास ओढ़ा दिया गया है। इस तरह हमारी भाषा और हमारा देश एक साधन के रूप में, अजेंट के रूप में जनता के बीच प्रस्तुत है।

दुर्भाग्य से बाज़ार की इस मनोवृति से भारत की स्थिति बुरी तरह प्रभावित है। वह सोच रहा है कि यही बाज़ार उसे लाभ पहुँचाएगा, बाकी सारी चीज़ें व्यर्थ हैं। हमारा सर्वाधिक प्रसार माध्यम ‘फिल्म’ आज बाज़ार और बाज़ारू माफिया के अधीन है। सारी सामाजिक मानवीय विषयवस्तु वहाँ से गायब है, केवल व्यापार-उद्योग से संबन्धित घराने, वैसे ही चरित्र और वे ही बातें वहाँ हैं, जो बाज़ार को पालती-पोसती है। यह सारे काम हिन्दी को फैलाने में नहीं, बाज़ार के काम की बनाने में उपयोग हो रहे हैं, क्योंकि सार्थक और उपयोगी भाषा के रूप में अँग्रेज़ी की स्थापना वहाँ भी है। सारे फिल्मी कलाकार, निर्देशक एवं दूसरे अपनी बातचीत, साक्षात्कार आदि अँग्रेज़ी में देते हैं, उनके लिए पाण्डुलिपि रोमन में बनाई जाती है। जिस भाषा ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुँचाया, उसके प्रति उनकी क्या अवधारणा और मान है, यह उनके तौर-तरीके, बातचीत और साक्षात्कार से स्पष्ट होता है। जिसकी कमाई खा रहे हैं, उसी भाषा को नीचा दिखा रहे हैं, क्योंकि वह तो उनके लिए उसी मंच तक सीमित है, जो उन्हें इस भाषा में बोलने का पैसा देता है – इसके बाद उससे कोई मतलब नहीं। इसे ही हिप्पोक्रेसी कहते हैं। कुल मिलाकर हिन्दी और भारतीय भाषाएँ आज इस प्रकार बदल चुकी हैं कि आज उसकी पीठ पर दूसरे का माल और उसके हाथ दूसरे की चिट्ठियाँ वहन कर रहे हैं।

साहित्यकार भी जब यह सब भूलकर पात्र के चरित्र की रक्षा या संवाद की स्वाभाविकता के नाम पर बाज़ारू भाषा का प्रयोग करने लगता है, तो दरसल वह उसी बाज़ार को बल पहुँचता है। एक तरफ जिसके विरोध में लिखता है दूसरी तरफ जनता को गुलाम बनाने वाली भाषा को पालता-पोसता भी है। बाज़ार बड़ी चालक चीज़ है, वह उपभोक्ता की प्रवृति और स्वभाव को जानता है। हमारी अपनी भाषा प्रति उदासीनता को उसने पहचान लिया है। वह जानता है कि भारतीय उपभोक्ता, चल रही चीज़ को ज्यों का त्यों चलने देता है, अपनी ओर से कोई प्रतिरोध नहीं करता। वरना क्या कारण है कि बांगलादेश में पहुँचने वाली ‘हमाम साबुन’ की टिकिया पर बंगला से लिखा होता है और भारत में अँग्रेज़ी में।

आज भारत का छोटा सा बाज़ार भी बड़े बाज़ार का अनुकरण कर रहा है। देशी चीज़ों में, यहाँ तक कि जड़ी-बूटियों, आयुर्वेदिक औषधियों के नाम भी अँग्रेज़ी में लिखे जा रहे हैं, क्योंकि वह भारतीय बाज़ार को सिद्ध करने का तरीका समझा जाने लगा है। और है भी, क्योंकि उपभोक्तावाद ने भारत की स्वदेशी मानसिकता समाप्त कर उसे फैशन के अधीन कर लिया है। भाषा के इस स्वरूप को देखकर नहीं लगता कि मैकाले या चार्ल्सवुड का दृष्टिकोण गलत था। वे लोग भाषा तक बाज़ार को लाना चाहते थे, आज हम बाज़ार तक भाषा लिए जा रहे हैं। शायद यही उनका भी अगला कदम होता.....!

आज विश्व की सूचना प्रौद्योगिकी पर भारतवंशियों का दवाब है, परन्तु वे प्रायः नाम के ही भारतीय हैं, सोच में नहीं। उन्हें भी भारतीय भाषा के प्रति कोई लगाव नहीं है। वे प्रायः बाज़ार के स्वरूप में स्वयं ढल गए हैं, उसी में शिक्षित या फिर दीक्षित हैं। वे बाज़ार की ज़रूरत के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी बना रहे हैं। वरना क्या यह संभव नहीं था कि हिन्दी या भारतीय भाषाओं का प्रयोग कम्प्यूटर और इंटरनेट में अधिक होता, नागरी लिपि के की-बोर्ड बनते और कम्प्यूटर में हिन्दी भाषा डालने के लिए कम्प्यूटर की संकेत भाषा नागरी लिपि के अनुरूप बनाकर उसके प्रयोग को सुगम बनाते। खेद है कि भारतीय बाज़ार खुद हिन्दी या भारतीय भाषाओं का वास्तविक लाभ लेना नहीं चाहता। वह भी भाषा का उपभोग करना चाहता है..........................


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