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ISSN 2292-9754

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12.05.2015


या रब तू मुझको ऐसा जीने का हुनर दे

या रब तू मुझको ऐसा जीने का हुनर दे
जो मुझसे मिले इंसां उसे मेरा कर दे

नफ़रत बसी हुई है जिन लोगों के दिल में
परवर दिगार उनको मुहब्बत से भर दे

मैं ख़ुद के ऐब देखूँ और लोगों की ख़ूबियाँ
अल्लाह जो दे तो मुझे ऐसी नज़र दे

बेख़ौफ़ जी रहा हूँ गुनहगार हो गया
दुनिया का नहीं दिल को मेरे अपना ही डर दे

जो लोग भटकते हैं दुनिया में दरबदर
मोती का ना सही उन्हें तिनकों का तो घर दे

हर हाल में करते हैं जो शुक्र अदा तेरा
‘इरशाद’ को भी मौला तू बस ऐसा ही कर दे


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