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04.12.2012

झुनकू चाचा दावत चले

एक थे झुनकू लाल। मिठाई खाने के बेहद शौकीन। मिठाई मिल जाए तो खाना-पीना छोड़ दें। पर किस्मत ऐसी पाई थी कि मिठाई की कौन कहे, दो वक्त भरपेट खाना मिलना भी मुहाल था। काम-काज कुछ करते नहीं थे। इधर-उधर बैठकर सारा दिन गुज़ारते थे।

झुनकू को जब कभी भोज-भात में जाने का मौका मिलता, वह बिल्कुल न चूकते। जमकर तर माल उड़ाते। इतनी मिठाइयाँ खाते कि मुँह पर दो दिन तक मक्खियाँ भिनभिनाती रहतीं।

एक बार की बात है। झुनकू के दिन उपवास में बीत रहे थे कि एक दिन उनके पास न्योता आया। दूर के रिश्ते की मौसी ने बुलवाया था। बेटी की शादी थी। झुनकू झुनझुने की तरह खुशी से बज उठे। बक्से में रखे मुड़े-तुड़े कपड़े निकाले, पगड़ी बांधी, हाथ में लाठी थामी और चल पड़े। गांव के बच्चों ने देखा तो पीछे हो लिए-

’’झनकू चाचा, झनकू चाचा,
दावत खाने कहां चले,
खाकर आना गले-गले।‘‘

झुनकू ज़मीन पर लाठी पटक कर चिल्लाए, "क्या बिना दावत के मैं बाहर नहीं निकलता?"
शाम होते-होते झुनकू मौसी के घर पहुँच गए। पूरा घर सजा हुआ था। औरतें ढोल बजा-बजाकर गा रही थीं। आदमी इंतज़ाम में लगे हुए थे। हर तरफ गहमा-गहमी थी। कहीं हलवा बन रहा था, कहीं पकौड़े तले जा रहे थे। तरह-तरह की खुशबुओं से पूरा वातावरण महक रहा था। झुनकू की लार टपकने लगी। वह पालथी मारकर वहीं पसर गए।

तभी दो आदमी लड्डुओं से भरा झाबा लेकर पास से गुज़रे। अब तो झुनकू का धीरज टूट गया। लड्डुओं की महक से तन में झुरझुरी दौड़ गई। देसी घी में डूबे मोतीचूर के लड्डू।

झुनकू का चैन छिन गया। कभी इधर बैठते, कभी उधर। कभी इधर झाँकते, कभी उधर। बस, एक ही प्रतीक्षा थी कि कब लड्डू खाने को मिलें। पर लड्डू लेकर लोग जाने किस तहखाने में गुम हो गए थे।

में बैठे रहे कि शायद अब कोई आ जाए, लड्डू का थाल लेकर। पर कोई न आया। चिराग बुझा दिए गए। घर की औरतें भी लेट गईं। कुछ देर सब हंसी-मज़ाक करते रहे, गाते-गुनगुनाते रहे, बारात की तैयारियों की बातें करते रहे, फिर सो गए।

गर्मियों के दिन थे। अमावस का आसमान एकदम साफ खुला हुआ था। तारे चंपा के फूलों की तरह खिले हुए थे। सब ओर सन्नाटा छाया हुआ था। कभी-कभी कोस भर दूर सड़क पर गुज़रने वाले भारी वाहनों की घरघराहट सुनाई दे जाती थी।

अभी आधी रात नहीं बीती होगी कि किसी के कूदने की आहट पाकर मौसी की नींद टूट गई। शादी-ब्याह का घर। कमरों में दान-दहेज, गहने-जेवर सब रखे हुए थे। मौसी डर गईं। दरवाज़ा खोलकर चिल्लाते हुए बाहर भागीं- "पकडो-पकडो, चोर-चोर।"

सिरहाने लाठियाँ रखकर सोए लोग जाग उठे। घर को चारों तरफ से घेर लिया गया। तभी कमरे से निकलकर एक साया भागता दिखा। ’मारो-पकड़ो‘ के शोर से सारा गाँव गूँज उठा। चोर को घेरकर दनादन लाठियाँ पड़ने लगीं।

लाठियां पड़ते कुछ देर हो गई, तो किसी ने कहा, ’’अरे रोशनी तो लाओ। महाराज का चेहरा तो देखें।‘‘
रोशनी लाई गई। चोर का चेहरा सामने आते ही सब हैरान रह गए।

"अरे झुनकू तुम ?" लोगों के मुँह से निकला।

झुनकू कमर पकड़े दुहरे हुए जा रहे थे।

"हाय मेरे लाल!" मौसी ने उन्हें लिपटा लिया, "इतनी लाठियाँ पड़ गईं, पर तुम बोले क्यों नहीं ?"

झुनकू कुछ कहने को हुए पर मुँह से ’गों-गों‘ के सिवा कुछ न निकला। निकलता भी कैसे ? मुँह में चार लड्डू जो भरे हुए थे।

झुनकू लौटकर आए तो बच्चों ने फिर घेरा-

’’झुनकू चाचा दावत चले,
लड्डू के बदले डंडे मिले।‘‘

झुनकू मुँह छिपाकर घर में घुस गए।



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