अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.19.2014


जीवन..... कल और आज

जीवन की परिभाषा थी
कल तक उस नदी सी
जो टकराती है दो किनारों से
सुख-दुःख के, जीवन-मरण के,
आशा-निराशा के, हर्ष-विषाद के,
संजोए अनुभवों की मिट्टी
बढ़ती है प्रतिपल आगे।

बदले रुख, पाए दोहरे चेहरे
फिर अंतर यूँ आया
सबके जीवन में पल-प्रतिपल,
इक खौफ़ है समाया।
एक अकेलेपन की दीवार
एक संत्रास की छाया।
रिश्तों में बढ़ रही दूरियाँ
एक अजनबीपन- सा आया।
अस्तित्व की तलाश ने
है यह अलगाव उपजाया।
अपनों ने अपनों से ही,
क्यूँ यह दुराव पाया ?
जीवन के बदले मानदण्ड,
स्वार्थों ने सिर उठाया।
मानवता को नीचे पटक,
भौतिकता ने प्रश्रय पाया।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें