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ISSN 2292-9754

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01.01.2015


इस नव वर्ष में

दुआओं में हाथ उठाएँ
हाथ जोड़ें या शीश नवाएँ,
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव
हमारे हृदयों में भर जाए।

कटें नफ़रतों की फ़सलें
धरती पर अमन-चैन लहलहाएँ,
गिरें स्वार्थों के मीनार
चले परमार्थ की बयार,
अत्याचार और शोषणों की
कुप्रथा रुक जाए,
कर्त्तव्यों और अधिकारों की
नई इबारत लिखी जाए।

निष्ठा से हम हर कर्त्तव्य निभाएँ,
हर भ्रष्टाचार और बेईमानी दूर भगाएँ।
पाखण्डों-आडम्बरों, झूठ और कपट से
हम सब करें किनारा,
नेकनीयती और ईमानदारी ही
‘धर्म’ हो हमारा।

मार-काट और जेहाद-रूप में
अब धर्म न हो परिभाषित,
बाबाओं की अन्ध श्रद्धा में लोग,
न पुनः हों निर्वासित।
सतीत्व नारियों का
न भंग होने पाए,
शिक्षा का उजाला
घर-घर में फैल जाए।

गोलियाँ और बम-धमाके
न और अग्नि बरसाएँ।
पेशावर-सा निर्मम बाल-संहार
न कभी दुहराया जाए।

फिर धरती का स्वर्ग कोई
न प्लावन में हो विनष्ट,
करें पोषिका का संरक्षण,
छोड़ें छेड़छाड़ और कष्ट।
स्वच्छता हो प्राथमिकता हमारी
भागे दूर बीमारी-महामारी।

गट्टू ले रहा कितनी जानें
करें प्रतिकार: फर्ज़ पहचानें।
नशों की दलदल में युवा
न जीवन व्यर्थ गँवाएँ।
रोज़गार के हों अवसर
प्रतिभाएँ नयी उड़ान पाएँ।

अवसरवादी राजनीति से
अब हम चेत जाएँ,
यौन-शोषण और बाल-श्रम पर
पूर्ण विराम लग जाए।
भटके न कोई वृद्ध
विवशता और बदहाली में
आशीर्वचनों की पूँजी
है निहित उनकी ख़ुशहाली में।

सच्चरित्रता - सदाचरण को हम
दें सर्वोपरि स्थान;
जब ‘मैं’ से ‘हम’ की सोचेंगे
है तभी ‘उत्थान’, तभी ‘कल्याण’।


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