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ISSN 2292-9754

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02.20.2016


अन्धी दौड़

सूचना-बहुल तंत्र का
यूँ आया है ज़माना
अब पास है हमारे
‘मोबाइल बैंकिंग’ का खज़ाना
बिना दौड़-धूप या संघर्ष के हम
बनते हैं ‘हैशटैग क्रांति’ का हिस्सा
‘सेल्फ़ी’ के सहारे कहते
हाल-ए-दिल का क़िस्सा।
करते बेसब्री से हम
‘गूगल कार’ का इंतज़ार।
इंटरनेट से जोड़ते चश्मे
‘गूगल ग्लास’ को हैं बेक़रार।
रच लिया है हमने
एक क्लिक की दूरी पर
सुख-दुःख बाँटने का
एक अन्तरंग संसार।
पुराने को टाटा, बाय बाय
हर पल नये की दरकार
कितना कुछ छोड़ पीछे,
कितना नया कर शुमार
जीवन को दे रहे
तकनीकी-यांत्रिक आधार।
हर पल की उत्कंठा
है कहलाती व्हाट’स ऐप्प
फ़ेसबुक के सहारे
मिटाते अब हम गैप
सब अपने-से लगते
पर आत्मीयता है लुप्त
दोस्त-रंगीनियाँ चारों ओर
पर अकेलेपन का अंधेरा घुप्प।
उचित-अनुचित का विवेक छीन
लील रहा हमें यह पारावार।
जीवन सुगम हुआ या जटिल हुआ?-
यह करना होगा पुनर्विचार।
बहुत तेज़ दौड़ रहे हैं हम
अब हाँफ रही है साँस
थोड़ा भी गँवाते हम
लेकर ‘और अधिक’ की आस
थक गए जुटा कर ताम-झाम,
अब सुकून की है तलाश।
हो मुक्त यंत्र-संचालित मस्तिष्क,
उन्मुक्त हो हृदयाकाश।


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