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01.26.2012

बचपन के ज़माने
मीना पांडे

पतंग की डोर-सी, सपनों की उड़ानें दे दो,
दो घड़ी के लिए, बचपन के ज़माने दे दो।

जहां ये मतलबी है, दिल यहाँ नहीं लगता,
मुझपे एहसान कर, दोस्त पुराने दे दो।

गाँव की हाट को बेमोल है रूपया-पैसा,
बूढ़े दादा की चवन्नी के ज़माने दे दो।

थके-थके से हैं, दिन रात, मुझे ठहरने को,
माँ के घुटनों के, वो गर्म सिरहाने दे दो।

निगाहें ढूँढती हैं, उन सर्द रातों में, मुझे
फिर ख़्वाब में, परियों के ठिकाने दे दो।

ये तरसी हैं, बहुत, ला अब तो, मेरी
इस भूख को, दो-चार निवाले दे दो।

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