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तुम्हारे चित्र
बोलते ही नहीं
गीत सुनाते हैं
तूलिका के रंग
धुन बन
कानों में गुनगुनाते हैं
चित्रों की
भाव- भाषा
अनकहे शब्द कह जाते हैं
खो जाती मैं
इंद्रधनुषी जगत में
कल्पना के सौ-सौ पंख लग जाते हैं
चित्रों में वर्णित
कथा नायक
अपने ही घर से आते हैं
निहार एकटक
कलाकृति अनुपम
ठगे से हम रह जाते हैं
अनुरंजित छवि
लालित्य जगाती
हम प्रबुद्ध प्रशंसक बन जाते हैं
चित्रों का सौंदर्य
समा जाये जग में
हृदय में यही विचार आ जाते हैं।
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