अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
07.30.2007
 
पास वर्ड
मीना जैन

सब सराहते मेरा हस्त लेख बहुत सुंदर
लेकिन अब घर-घर आ गए थे कंप्यूटर
मुझे भी शुभचिंतकों ने कहा-
"तुम भी सीख लो किसी लर्निंग सेंटर में जाकर"

कंप्यूटर क्रांति से बदल रही थी दुनिया
ई-मेल अब चलने लगे, बंद हो गईं चिठ्ठियाँ
मैने भी निश्चय कर डाला
पास के कंप्यूटर सेंटर में नाम लिखा डाला

सीखने की आशा से जाती
घर के काम छोड़-छाड़ कर
वहाँ कभी सर्वर न चलता
कभी खाली न होते मॉनीटर!

मैंने सोचा ऐसे न चलेगा
एक दिन निदेशक जी को घेर लिया
वे तमिल में बात करते थे
मैंने लर्निंग सेंटर से मुँह फेर लिया!

पति महोदय से अनुनय-विनय कर
घर पर ही चला सीखने का सत्र
इन्होंने आधारभूत बातें समझाईं
मुझे जादू की पिटारी ही लगा यह यंत्र

मैंने कहा लिखकर रख लूँ पास वर्ड
पति बोले- "इसे यहाँ-वहाँ लिखते नहीं
यह शब्द- भेदी वाण के समान है
इसके बिना कंप्यूटर के पटल खुलते नहीं|"

एक दिन मैं बैठी कंप्यूटर पर कविता लिखने
लेकिन क्या करूँ पास वर्ड तो याद नहीं!
मैंने पूछा अपने आठ वर्षीय पुत्र से
तुम पास ही मँडराते क्या तुम्हें भी पता नहीं?

उसने नकारात्मक सर हिलाया
उसका भोलापन उस पल मुझे न भाया!
वह बोला - "पासवर्ड तो सीक्रेट होता है"
उसके कंप्यूटर ज्ञान पर मेरा मन झल्लाया!

अब मैं बहुत कुछ सीख चली थी
लेखनी की जगह कंप्यूटर ने ली थी
फिर भी बेटे को अधिक ही आता था
समस्या आने पर उससे ही पूछा जाता था।

एक दिन हिसाब की डायरी
पतिदेव के हाथ लग गई
और एक पृष्ठ पर लिखे ‘देवदूत‘ पर
उनकी नजर पड़ गई!

उन्होंने भेद भरे स्वर में पूछा
ये ‘देवदूत‘ कौन है?
मैंने कहा- ‘अजी छोड़िए न!
देखिए! आज सासू माँ बड़ी मौन हैं!’

“कौन है देवदूत ? बतलाओ-
वरना बात ठीक नहीं!"
मैंने कहा -‘जो आप समझ रहे हैं,
वह कदापि नहीं!‘

गोल- मोल उत्तर सुनकर
इनका पारा गरमाया
बोले छोड़ूँगा देवदूत को नहीं
मैंने कहा-‘जाने दीजिए, यमदूत तो नहीं!‘

बेटा बोला-‘पापा मैं बतलाऊँ!‘
ओह! तो बात यहाँ तक पहच चुकी है!
बेटे को भी मालूम है!
मुझे कोई भनक तक नहीं!

मैंने कहा उलझिए मत देवदूत से
हिसाब की डायरी में कोई हेरा फेरी नहीं!
रुपए दीजिए राशन पानी के लिए,
हाथ में अब मेरे रुपए नहीं!

पति कोप भवन में जा पहुँचे;
झनझनाकर कुछ चटकने की ध्वनि आई!
शीशे का फूलदान चकनाचूर हुआ
सासू माँ दौड़ी- दौड़ी आईं!

क्रोध से इनका मुँह लाल था!
मेरा हँसते- हँसते बुरा हाल था।
मस्कराए बिना ये भी रह न सके, जब सुना
‘देवदूत‘ तो मेरा नया पासवर्ड था!

लो! मैंने फिर गड़बड़ कर डाला!
अपना पासवर्ड तुम्हें बता डाला!
अब तुमसे पहले मुझे घर पहुँचना है,
जाकर अपना पासवर्ड बदलना है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें