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09.01.2007
 
ग्लोबल हुआ कार्य क्षेत्र
मीना जैन

 

तुम्हारे  दिन   उजले    हुये

और      हमारे     अँधियारे

तुम  क्या  बसे   परदेस  में

सूने  हुये घर  और  गलियारे

 

तुम्हें तो कभी  भाता नहीं था

मेरी ऊँगली छोड़ कहीं ठहरना

उन मधुर पलों  को आज भी

मन चाहे पीछे मुड़कर पकड़ना

अनुगूँज  तुम्हारी  बातों  की

सुनती मैं  हर दिन  भिनसारे

 

याद  है  आज   भी   वह   दिन

पुरस्कार में ग्लोब मिला था तुमको

मैंने      आशीर्वचन      उचारा

विश्व में  नाम कर  दिखाना हमको

 

आज  जब  ग्लोबल  हुआ कार्यक्षेत्र

क्यों संकुचित  हो गये विचार हमारे

 

तुमने तो मेरी कल्पना  से भी

ऊँची   उड़ान    भर    डाली

हमारी   दुनिया   हुई   सूनी

तुमने शायद  दुनिया  पा  ली

बहुत   चुप-चुप   से  रहते हैं

ठहाके लगाने वाले बापू तुम्हारे

यूँ  ही    होता    रहा  यदि

प्रतिभाओं    का    वहिर्गमन

रह जायेंगे  माता-पिता  अकेले

कैसे होगा दायित्वों का निर्वहन

संभावनाएं  तलाशनी होंगी यहीं

पुकारते हैं घर के  आँगन-द्वारे।



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