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05.31.2008
 
दूर दूर रहते हुये
मीना जैन


कभी दूर- दूर रहते हुये
होते हम कितने पास-पास
कभी पास- पास रहते हुये
होते हम कितनी दूर-दूर
कभी किसी उत्सव के दिन भी
मन हो जाता उदास-उदास
कभी उदासी के क्षण में भी
उभरता अधरों पर स्मित हास
बहुत सी कही बातों के बीच
अनकहा बहुत रह जाता है
बहुत कुछ सुनते-सुनते कभी
कुछ अनसुना कर दिया जाता है
हँसते-हँसाते चेहरों के पीछे
कभी मायूसी भी रहती है
उदास-उदास आँखें किसी की
कोई खुशी तलाशती रहतीं हैं
कभी अवकाश में बैठ बाँचते
लेखा-जोखा खोने-पाने का
लगता जैसे सब कुछ बेमानी
मौसम का क्रम आने-जाने का
मन की गति कोई क्या जाने
कभी हँसा दे तो कभी रुला दे
कभी चुप्पी के बीच कहीं
कानों में आकर एक गीत सुना दे।


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