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03.15.2008
 
भीड़ में
मीना जैन

दिवस, मास और वर्ष बीत जाते हैं
कैलेंडर के पृष्ठ पलटते जाते हैं
भीड़ में से कुछ चेहरे गुम हो जाते हैं
नये चेहरे भीड़ में शामिल हो जाते हैं
नवीन का अर्थ स्फूर्ति, आनंद
पुरातन बन जाता इतिहास
जो बिछड़ गये, याद उनकी टीसती
लगता यूँ जैसे, आज भी हों आसपास
भीड़ के इन चेहरों में
कितने चेहरे हैं अनचीन्हें
लेकिन सबके बीच एक रिश्ता
बन जाता है अनजाने
अनहोनी जो घटे कहीं पर
हर कोई होता संबद्ध
शायद यह मानवता का नाता है
मानव जिसके प्रति प्रतिबद्ध
धर्म- जाति, देश- काल से ऊपर
मानव से मानव का रिश्ता है
हिंसक घटनाएँ होती कहीं
प्रतिवाद का स्वर भी उठता है
अच्छे लोग न खो जायें
इस दुनिया की भीड़ में
उनकी पहचान बनाये रखना
फरिश्ते हैं वे भीड़ में ।


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