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09.22.2007
 
बादल से बातें करती हूँ
मीना जैन

कभी-कभी मैं बादल से बातें करती हूँ
वर्षा की बूँदों को अपलक तकती हूँ

हरर-हरर चली पुरवाई
बादल की चिट्ठी धरती पर लाई
धरती ने पहन चुनरिया धानी
बाँची बादल की वानी

सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू
अपनी साँसों में भरती हूँ

मेरे मन के आँगन में
कभी कोई बादल छा जाए
छेड़ रागिनी गीतों की
छम से वहीं बरस जाए

नेह भरा संस्पर्श कोई
मन में अनुभव करती हूँ

सागर, सूरज, बादल, पानी
इतनी है केवल राम कहानी
जल बिन म
रुथल सी धरती
जल से जीवित जिंदगानी

जल-जलधर का निराला खेल
मंत्र मुग्ध हो निहारा करती हूँ।


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