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03.11.2014


वो हल्का सा गुलाल

आँखों की जलती बुझती रोशनी के बीच कहीं
वो हल्का सा गुलाल-
क्षितिज के मद्धम से अंधरों को अपने में समेटे
चाँद की पेशानी पर
चमचमाता अबीर बनकर
हर पूनम को सुलगता है।

आस लगाये बैठी हूँ
उस होली की सुबह का
जब ये चाँद पूनम से उतर कर
अमावास के गुलाल में सितारे भरकर
मेरे मन के अँधेरों की पेशानी पर
इन्द्रधनुष सा रोशन होगा।

मेरा जीवन
अमावास से बने उजालों के
एक अथाह सागर में भीगा होगा।


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