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| 04.28.2007 |
| तुम्हारा आगोश मीना चोपड़ा |
| किरणों के पानी से धुली सूरज की साँसों में ढली गरिमा – चौखट पर मेरे जिस्म की हर रोज़ जला करती है। आँखों में छुपाए परछाई आसमान की दूर मुस्कुराता झरना दुधिया सफेद पानी से बेजान मिट्टी को धोता है खुशबू में बदलता मेरा बदन हवा का हाथ थामें ऊँचाइयों को छूता है। आसमान की विशाल बाहें अनन्त से उठकर समेट लेती हैं मुझे मुझमें सिमट कर। लेकिन – मेरी खामोश आवाज़ को ऐसा क्यों लगा कि यह आगोश तुम्हारा था। |
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