अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
तुम्हारा आगोश
मीना चोपड़ा

किरणों के पानी से धुली
सूरज की साँसों में ढली
गरिमा –
चौखट पर मेरे जिस्म की
हर रोज़ जला करती है।
आँखों में छुपाए
परछाई आसमान की
दूर मुस्कुराता झरना
दुधिया सफेद पानी से
बेजान मिट्टी को धोता है
खुशबू में बदलता मेरा बदन
हवा का हाथ थामें
ऊँचाइयों को छूता है।

आसमान की विशाल बाहें
अनन्त से उठकर
समेट लेती हैं मुझे
मुझमें सिमट कर।

लेकिन –
मेरी खामोश आवाज़ को
ऐसा क्यों लगा
कि यह आगोश
तुम्हारा था।
अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें