थिरकन मीना चोपड़ा
प्रकृति की लय पर विचलित शब्दों ने संवेदनाओं को प्रेरित किया नज़र में उठे पानी की तरंगों में भिगो दिया।
कई नए प्रतिबिम्ब उभरे कई कहानियाँ भी।
रुह का इस तरह से पतझड़ के उड़ते सूखे पत्तों पर एक नया नृत्य और हवाओं पर थिरक थिरक चलना।
जीवन का यह परिचय कुछ अधूरा सा नहीं है क्या?