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05.03.2012
 

सरहद
मीना चोपड़ा


मेरी खिड़की के बाहर एक डूबता सूरज है
जिसके रंगों को मैंने आँखों से छुआ
और पलकों पे सजाया है।

रुकी हूँ उस पल के लिये
जब ये रंग मेरे लहू में घुलकर
मेरी नस-नस में बहेंगे
और ये नसें मेरे जिस्म से निकलकर
मेरी रुह में बहेंगी।

मेरा सूरज इतने करीब है मेरे कि
मैं अपनी आँखों की रोशनी से
उसके जिस्म को छूती हूँ।

रुकी हूँ उस पल के लिये
जब मेरी रुह आँखों की रोशनी बनकर निकलेगी
और सूरज सिमटकर मुझमें आ ढलेगा,
मैं क्षितिज बनकर उन रंगों में नहा लूँगी।

उस एक पल के सपने को लिये
जी रही हूँ तो सिर्फ़ तुम्हारे लिये।
तुम जो मेरी खिड़की के बाहर
ज़िन्दगी की सरहद पर
हर रोज़ डूब जाते हो
और मैं अपने खाली हाथों में
तुम्हारे रंगों को बटोरे
अँधेरों में खो जाती हूँ।


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