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05.03.2012
 

संवाद
मीना चोपड़ा


एक पल निरंतर
शून्य के गर्भ में ओझल
                 दूसरी दुनियाँ की ओट से झाँकता
निःशब्द गूँज में बहते
                 आकाश की छवि को निहारता
ठहरा बहाव
ज़मीन में डूबता
           उभरता
                 मिट्टी भरी गोद से जूझता

अनगिनित आँखों में चूर
           अचम्भित सा
                 भ्रमित सा
देखता रहा कहीं दूर
सन्नाटों में लिपटी शब्दावली
और सनसनाहटों की
                 नित नई नृत्य-नाटिका।

चुपचाप चलता रहा
एक संवाद निरंतर –
ढूँढता रहा
अपनी अंतरित भाषा का मौन

अन्त तक।

कई मुखड़ों में उभर
कई गीतों से गुज़र
सुरों की सुरा में मस्त
           डगमगाता रहा
                 गुनगुनाता रहा
                       कँपकँपाता रहा

 अनन्त तक।


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