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05.03.2012
 

रात
मीना चोपड़ा


चाँद से झरते हुए झरने में
नहा कर निकली थी
पूनम के गहनों से सजी
दुल्हन बनी रात!

       सितारों जड़ी झीनी चूनर ओढ़े
          चाँदनी का सिंदूर माँग में अपनी भर के
             उतरी थी दबे पाँव
                   क़्त के सीने मे कहीं से
                      हाथों में किरणों के कंगन पहने
                          मदमस्त, महकती हुई रात!

रुक गई थी रुख़ पर
किसी अजनबी चिलमन के क़रीब
तरसती नज़रों की छटपटाहट
का नगीना बनकर!

चुभ रही है अब तक
झील सी आँखों के किनारों पर
वह झिलमिलाती, मचलती हुई रात!

पहन कर उँगलियों में अपनी
उसी नगीने की अँगूठी
          जागते सोते सपनों के झरोखों
          में कहानियाँ लिखती
उमड़-उमड़ सदियों में डुबकियाँ लेती है
          सदियों से सदियों तक बहती हुई
                यह रंगों से बनी रंगों भरी रात।


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