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| 04.18.2008 |
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परिचय ? |
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भूल से जा गिरी थी मिट्टी में सिंदूरी आँच को ओढ़े इसकी वही हाथ बादलों में बिजली की तरह शून्य की कोख से जन्मी ये लकीरें पैर ज़मीं पर कुछ ऐसे अटक गए हैं ये सनसनाहटे हैं कि छोड़ती ही नहीं मुझको स्वयं से स्वयं का परिचय? |
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