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| 07.06.2008 |
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मुट्ठी भर |
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मुट्ठी भर वक़्त पोटली बनकर रख दी थी आज जब भूल से तुम बैठी हूँ खोजने तो इंतज़ार है तो बस एक ही इस बाहर सम्हाल कर |
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