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05.03.2012
 

मुट्ठी भर
मीना चोपड़ा


मुट्ठी भर वक़्त
कुछ पंख यादों के
बटोर कर बाँध लिये थे
रात की चादर में मैंने।

पोटली बनाकर रख दी थी
घर के किसी कोने में बहुत पहले।

आज जब भूल से तुम
ख़्वाब में आए
तो याद आ गई।

बैठी हूँ खोजने तो
कुछ मिलता ही नहीं
टटोलती हूँ, ढूँढती हूँ
नज़रें पसार कर
पोटली तो क्या
घर के कोने भी
गुम हो चुके हैं सारे।

इंतज़ार है तो बस एक ही
कि वह रात एक बार फिर लौटे
बूँद-बूँद चेहरे से तेरे गुज़रे,
भर के हाथों में उसे सहलाऊँ मैं
होठों से चूमूँ
पोटली में रख दूँ फिर से

इस बाहर सम्हाल कर
अपनी पलकों के तले।


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