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05.03.2012
 

कुछ निशान वक़्त के
मीना चोपड़ा


झील से झाँकते आसमान की गहराई में
बादलों को चूमती पहाड़ों की परछाईयाँ
और घने पेड़ों के बीच फड़फड़ाते अतीत के चेहरे
झरनों के झरझराते मुख से झरते मधुर गीत संगीत
हवाओं पर बिखरी गेंदे के फूलों की सुनहरी खुशबू
दूर कहीं सजदों में झुकी घंटियों की गूँज
बाँसुरी की धुन में लिपट कर चोटियों से
धीमे—धीमे उतरती मीठी धूप।

पानी में डुबकियाँ लगाती कुछ मचलती किरणें
और उन पर छ्पक—छपक चप्पूओं से साँसे लेती
ज़िन्दगी की चलती नौका
रात की झिलमिलाहटों में तैरती चुप्पियों की लहरें
किनारों से टकराकर लौटती जुगनुओं की वो चमक।

उम्मीदों की ठण्डी सड़क पर हवाओं से बातें करती
किसी राह्गीर के सपनों की तेज़ दौड़ती टापें
पगडंडियों को समेटे कदमो में अपने
पहुँची हैं वहाँ तक—जहाँ मंज़िलों के मुकाम
अक़्सों में थम गये हैं
झील की गहराई में उतरकर
नींद को थपथपाते हुए
उठती सुबह की अँगड़ाई में रम गये हैं।

*यह कविता मेरे बचपन और जन्मस्थल नैनीताल से प्रेरित है।


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