यहीं से उठता है वह नगाड़ा वह शोर वह नाद जो हिला देता है पत्थरों को झरनों को आकश को वही सब जो मुझमें धरा है। सिर्फ़ नहीं है तो एक स्पर्श जहाँ से यह सब उठता है।