लटकती रही आँखों के किनारों से
बादलों में छिपी बूँद की वह हल्की सी नमी छूट कर जा गिरी फिर पैरों पर बँधी पायल की छ्नक के
बीच कहीं छ्नछ्नाती सी
एक मिटती झनकार के सुरों को सजाती सी।
तैरता रहा, तस्सवुर
अतीत की मिट्टी में लिपटा इन छ्नछनाहटों को एड़ियों में पहने, देखता रहा मुसलसल, सपनों की अनगिनित कड़ियों को जोड़े धुँध में लिपटे हुए धुँध के मिटते चहरे।