धुआँ मीना चोपड़ा
उठता है मिट्टी के अन्तःकरण से वह धुआँ धुआँ क्यों है।
मिट्टी जो मेरी हथेली से लगकर बदल जाती थी एक ऐसे क्षण में जिसका न कोई आदि था न ही अन्त।
उसी मिट्टी से जो उठता है आज वह धुआँ क्यों है।