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रात के पानी में
बहती नदी के किनारे
घुल रहे थे।
इसे अमृत मानकर
हाथों में भरकर
घूँट घूँट पिया मैंने।
’मैं’ को उतारकर
’तुम’ को पहन लिया मैंने।
अपने अस्तित्व की झोली में
गुनाहों का शगुन रखकर
रुह के दरगाह को अर्पित
हो गई थी मैं।
शायद तुम भी — ?
कुछ पलों के लिए ही सही!
कैसा संयोग था यह।
कौन सा भोग?
किसकी इबादत?
सिजदा किसको?
खोज कैसी?
कैसा सपना?
चाह किसकी — ?
जो न मिटी न ही बुझी कभी!
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